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गुरुवार, जून 24

खाप पंचायते उनके फैसले और समाज पर उनका असर

ललित मोदी का बी सी सी आई को खाप पंचायत बताना ये बता गया कि हर आम ओ खास में खाप पंचायतों के कि कारगुजारियों का खौफ किस कदर हावी हो रहा है। शायद कुछ दिनों बाद ये बात मुहावरे के रूप में भी कही जाने लगे। हर वो बात जिसमें ऐसा संदेह हो कि किसी ग्रुप या विशेष जन का अमुक निर्णय सनकपने या दकियानूसीपने की हद के आसपास है या फिर ऐसा डिसीजन जिससे बिना वजह क़ानून को चुनोती मिल रही हो तो थोड़ी ठीक सी अकल रखने वाला अपने आप से या किसी दुसरे से ये ही कहेगा की यार फलाने की सोच तो बिलकुल खाप पंचायेती सोच है देखो तो क्या सनकी डिसीजन लिया इसने की पूरा का पूरा घर बर्बाद हो जायेगा इसका । ये तो बात हुई की कैसे मुहावरों का जन्म होता है अब बात करते हैं की किन कारणों ने तथाकथित न्याय पंचायतों के लगभग अनपढ़ न्यायधिशों को कहाँ से इस बात की प्रेरणा दी वो विस्मयकरी निजी स्वतंत्रा को अघात पहुंचाने वाले फतवे दे सकें। इनके सबसे पहले प्रेरणा स्रोत तो इस्लाम की व्याख्या करने वाले वो उलेमा वर्ग है जो अपने फतवों को क़ानून,देश और सरकार से भी ऊपर मानते हैं। इनके पास भी कारण है अपने फतवों के ऊपर मानने क्यों की ये फतवा देने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि एक आम मुस्लिम धर्मभीरू है और धर्म को सर्वोच्च मानता है ऐसे में कई बार उलेमा अपने मुस्लिम समाज में सस्ती लोकप्रियता अर्जित करने के लिए जानबूझ कर देश के कानून से टकराने वाले फतवे देते हैं ताकि मीडिया में वो चर्चा का विषयबन सकें और मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग भी इनके फतवों को समर्थन करता है । अक्सर देखा गया है कि इस तरह के फतवे उदारवाद और आधुनिकता के विरोधी होते हैं. ये तो हुआ प्रेरणा स्रोत नो १ अब बात करतें हैं राजस्थान में हुए गूजरों के आरक्षण आन्दोलन कि जिसमे गुजरों कि महापंचायत ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक तरह से ये पंचायत गुजरों कि शक्ति का प्रतीक थी जिसने राजस्थान की सरकार को गुजरों की मांग के आगे झुकने के लिए मजबूर कर दिया था। अब इन पंचायतों को अपनी इस शक्ति का अहस्सा हो चूका था। इसलिए ये पंचायेतें अब ऐसे आदेश जारी कर रही हैं जिनको देते समय सुप्रीम कोर्ट भी १० बार सोचे। अगर समय रहते इस तरह कि तमाम पंचायतों को काबू नहीं किया गया तो वक़्त दूर नहीं हैं जब देश में कानून का शासन और सरकार कि सत्ता ख़त्म हो जाएगी

शनिवार, जून 5

कुछ दिनों पहले शीला दीक्षित ने कॉमन वेल्थ गेम्स से पहले दिल्ली में ऑटो रिक्शा को बैन कर देना चाहिए ऐसा बयान दिया था। ऑटो रिक्शा वालों ने शीला दीक्षित के उस बयान का बड़ा ही जबरजस्त विरोध किया था। विरोध लाज़मी भी था भाई किसी के पेट पर लात मारोगे तो चिल्लाएगा तो जरूर। मुझे शुरू -शुरू में तो मुख्यमंत्री के इस बयान पर काफी गुस्सा आया की भाई अगर सड़क से ऑटो हटा दिए तो इन ऑटो वालों का जो होगा वो तो होगा ही दिल्ली की उस जनता का क्या होगा जिसके पास अपनी खुद की सवारी नहीं है । एक तो पहले ही ऑटो वालों पर फाइनेंस माफिया की मार पड़ रही। उस पर शीला दीक्षित का ये बयान तो कोढ़ में खाज जैसा दिखाई देने लगा । सरकार ने तो बसों के किराए पहले ऐसे बढ़ा दिए थे की पहले से दिल्ली की आम जनता को ऐसा लगने लगा था की सरकार बस में बैठा कर हम से ऑटो का किराया मांग रही है। तो दिल्ली की जनता ने भी सोचा की जब सरकार बस से ऑटो का किराया ही वसूलना चाहती है तो क्यों न फिर ऑटो रिक्शा का ही इस्तेमाल किया जाये।
अब सरकार ऑटो को ही रोड से हटाने की बात करने लगी है । इन दिनों इस समस्या के बारे में सोच ही रहा था की एक दो ऐसे हादसे हुए की जिसने ये विश्वास दिलाया की शीला दीक्षित जी का निर्णय बिलकुल सही था।
जब जब ऑटो वालों से रोड पर सामना हुआ इन्होने ने मुझे लोहे के चने चबवा दिए। जब किसी ऑटो वाले को कही चलने के लिए कहता तो वो ऐसा किराया मांगता जैसे मैंने उसे चाँद पर चलने के लिए कह दिया हो। और अगर मैं कहता की भाई ये तो बहुत ज्यादा मांग रहे हो तो वो तुरंत गैस खतम हो जाने की घोषणा कर देता और ये रवैय्या किसी एक ऑटो वाले का नहीं कामोवेश सभी ऑटो वाले इसी फार्मूले को अप्प्लाई कर रहे हैं फिर मजबूरी में भैया से उनकी मोटर सायकल लेकर जब भी अपने गंतव्य की तरफ निकला तो मैंने पाया की ऑटो वाले भी ऑटो के हैंडल और मोटर साइकल के हैंडल में जातीय साम्यता होने के वजह से ऑटो को भी मोटर साइकल समझ कर चला रहे हैं जिधर मन हो रहा है उधर ही मोड़ ले रहे हैं । उनके ऑटो चलाने के इस खतरनाक तरीके की वजह से दो तीन बारी तो मैं ही मरने से बाल- बाल बचा। इन घटनाओं से सबक लेकर मुझे ये समझ में आया की सरकार के सारे फैसले जनहित विरोधी नहीं होते कुछ फैसले तात्कालिक नुक्सान करने वाले जरुर दिखाई देते हैं लेकिन उन निर्णयों में दूर की भलाई छिपी होती है । अब मैं इस मामले में sheela dikshit ji ke साथ हूँ आप क्या कहते हो दिल्ली वालों सड़क में दुर्घटना में मरना है या बसों में ज्यादा किराया दे कर शाम को सही सलामत घर लौटना है निर्णय आपके हाथ में है

सोमवार, मार्च 1

नक्सलवादी चाहे ये दावा करें कि वो जनता के हित के लिए हथियार उठाये हुए हैं पर इस बात से वो चाह कर भी इनकार नहीं कर सकते कि इनकी गोली से चाहे पुलिस का आदमी मरे, मुखबिर मरे या फिर आम आदमी हैं तो सारे इसी समाज का हिस्सा सारे आपस में किसी ना किसी तरह इंटरकनेक्टेड हैं। नक्सलवादी कहते हैं कि उन्होंने सरकार के अन्याय के खिलाफ आवाज और हथियार उठाया है पर मैं कहता हूँ कि सरकार से भी अत्याचारी तो ये खुद हैं । आखिर किसने इन्हें अपने हक कि लड़ाई लड़ने के लिए नियुक्त किया है और यदि किसी ने किया भी हैं तो इससे इन्हें मनमाफिक हत्याएं करने का लाइसेंस नहीं मिल जाता ये अपनी बहादुरी ऐसे लोग पर दिखाते पास अपने नून रोटी का जुगाड़ सोचने से अहम् मुद्दा कुछ नहीं होता।

शनिवार, फ़रवरी 27

माओवाद कितना सच कितना झूठ

चिदम्बरम जी ने जब से नक्सलवादियों, माओवादियों के खिलाफ़ जंग का ऐलान किया है तब से माओ वादियों के हमले पहले से और तेज हो गए हैं ।शायद ये नक्सलवादी ग्रहमंत्री के फ़ोलादी इरादों से कुछ इस कदर डर गए हैं कि उन्हें अब अपना अंत निकट दिखाई दे रहा है इसलिए वो अधिक से अधिक हत्याएं करके आम जनमानस को डरा कर सरकार के इरादों को शिथिल करना चाहते हैं। माओवादी प्रत्यक्ष रूप से तो सिर्फ उन्ही लोगों कि हत्याएं कर रहे हैं जो किसी ना किसी रूप से सरकार से जुड़े हैं। ज्यादातर या तो पुलिस वाले, सुरक्षा बल के जवान या फिर नक्सलियों द्वारा करार दे के मार दिए जाने वाले मुखबिर हैं। इनके बीच में पिस रहे हैं आम लोग जिनका कोई भी कसूर नही है जबकि नक्सल वादियों का ये ही दावा है कि वो जो लड़ाई लड़ रहे हैं वो जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं। ये ऐसे कौन से आधिकार हैं जिन्हें आम जनता के लिए पाने के लिए आम जनता को ही मारा जा रहा है।आगे जारी....

मंगलवार, फ़रवरी 16

शुक्रवार, फ़रवरी 12

अपनी पिछली पोस्ट मैं में मैंने गंगा में हो रहे प्रदूषण के मुद्दे पर मीडिया की भूमिका की बात की थी इस मामले में कभी भी मीडिया ने सकारात्मक काम नही किया अभी भी वो इस मुद्दे को भुना ही रहा है। जब तक कुम्भ शुरू नही हुआ तभी तक मीडिया की नज़र में गंगा में प्रदुषण था । जैसे ही कुम्भ शुरू हुआ मीडिया को इस से संबंधित अन्य मनोरंजक सामग्री मिल गई इसलिए कुम्भ ख़तम होने तक ये चलेगा और उसके बाद तो गंगा मैया मीडिया से ओझल ही हो जाएगी ...................

गुरुवार, फ़रवरी 4

भ्रष्टाचार की गंगा

तो स्टोरी को आगे लेकर चलते हैं -जैसा की मैंने पहले ही बताया कि गंगा अब लोगों कि नजर में चढ़ चुकी थी कई सारे स्वयंसेवी सगठनों ने गंगा कि रक्षा के लिए अवतार ले लिया था। जिन्हें सरकार से गंगा कि सफाई के नाम पर मनमाफिक ग्रांट मिल रही थी ऐसे में गंगा कि सफाई का स्वांग भरने में भला बुराई ही क्या थी । अभी इस ढकोसले में एक बड़े खिलाड़ी का आना बाकि था और उस खिलाड़ी का नाम था विश्वा हिन्दू परिषद् , स्वघोषित हिन्दुओं का सबसे बड़ा हितैषी। गंगा ,गौ की रक्षा की कसम खाने वाले इस संगठन ने सच में गंगा को बचाने के लिए एक बहुत बड़े आन्दोलन का सूत्रपात किया काफी हद तक दूसरों के मुकाबले अपने अभियान में इसे सफलता भी मिली माँ गंगा के भक्तों के दिलों में इस संगठन ने जगह भी बनाई। अभी पूरी सफलता मिली भी नहीं थी किराम मंदिर आन्दोलन का वक़्त आ गया ,गंगा बचाओ आन्दोलन से मिली सफलता को इस संगठन ने राम मंदिर मुद्दे में भुनाया और अब गंगा को बचाना छोड़ कर राम मंदिर बनवाने लगे। बीजेपी को सत्ता कि सीढ़ी चढ़वाने लगे। इस तरह से विश्वा हिन्दू परिषद ने गंगा का इस्तेमाल सिर्फ प्रसिद्धी पाने के लिए किया। अब बाबा रामदेव कि बारी है वो भी लोगों को गंगा को बचाने के लिए गोलबंद कर रहे हैं । कुम्भ का वक़्त है गंगा में सिर्फ नाक डूबा कर डूब मरने का ही पानी बचा है । हरिद्वार में तमाम भारत के साधू संत जमा हो रहे हैं देखें क्या होता है अभी मैंने बाबा रामदेव कि बात उपर की थी। भाई सेलिब्रेटी आदमी हैं मीडिया उनके साथ है शायद अब की बार कुछ चमत्कार हो ही जाए लकिन मुझे ना जाने क्यों लगता है की वो सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए ही इस मुद्दे को हवा दे रहे हैं जहाँ तक इलेक्ट्रोनिक मीडिया का सवाल हैं तो भाई यहाँ जो दिखता है वो ही बिकता है मिडिया जानती है की आम हिन्दू जनमानस गंगा से बहुत ही गहरे भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है इस लिए इस गंगा में हो रहे प्रदूषण तथा सरकार की लापरवाही पर कार्यक्रम बना कर आसानी से काफी साडी एड और टी। र पी बटोरी जा सकती है। अब कुछ विराम देता हूँ इस मुद्दे पर हम आगे बात करेंगे। जारी...........

बुधवार, फ़रवरी 3

मंगलवार, फ़रवरी 2

भ्रष्टाचार को गाली देना और गंगा को बचाने की वकालत करना आज के जमाने का फैशन सा हो गया है। जिसे देखो वही माननीय भ्रष्टाचार को मार भगाने और गंगा को बचा लेने की दुहाई देता नज़र आता है। आप भी बोलेंगे कि भाईसाब आप को तो हर बात में मीन मेख निकालने की आदत है आप की सोच ही नकारात्मक है हर अच्छे काम और उस काम को करने वाले को आप शक्क की निगाह से देखते हैं ये कोई अच्छी बात तो नही है तो मेरा जवाब होगा भैया मैं भी ये ही मानना चाहता हूँ की आप सही हों और मैं गलत, पर मैं क्या करूँ इतिहास हमेशा ही ऐसे मामलों में सकारात्मक रूख के साथ उम्मीद का दामन थामने वालों को गलत ठहराता आया है। अगर आप को विश्वास न हो तो आईये हम इतिहास के पन्नों में ही जाकर झाँक लें की इतिहास क्या कहता है । आज से कई साल पहले राजीव गाँधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए गंगा को बचाने की मुहिम शुरू की थी। गंगा को साफ़ करने के लिए प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के लिए बहुत बड़ी रक़म जारी की थी पर हाल वही ढाक के तीन पात रहा। उस समय के प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के मेम्बरों के परिवार तर गए पर गंगा मैली की मैली रह गई। हाँ राजीव गाँधी की मुहिम ने इतना रंग जरुर दिखाया की लोगों की नज़र में गंगा चढ़ गई । उसके बाद तो गंगा को बचाने वालों का ताँता सा लग गया। इधर सरकार गंगा लगातार ख़राब हो रही हालत पर घड़ियाली आंसू बहाती उधर जगह -जगह गंगा पर बाँध बना कर सरकार गंगा का गला घोटने की कोशिश करती। आगे जारी

गुरुवार, अक्टूबर 29

इस मर्मस्पर्शी करुणाजनक कहानी के मध्य एक और तथ्य उभर कर सामने आता है और सोचने को विवश करता है- पत्रकारों की वर्तमान दशा, कल जिस पत्रकार(महात्मा गाँधी, मदन मोहन मालवीय, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि) से डर कर अँगरेज़ पहले आवश्यक सुधार करने और बाद में जिनकी वजह से देश से भागने पर मजबूर हुए आज उसी पत्रकार की हालत ये हो गई है की जायज़ काम करवाने के लिए भी उसको अफसरों और नेताओं के सम्मुख मिमयाना पड़ता है । आख़िर इस तरह गुठनेt टेकने की वजह क्या है मेरी नज़र में कुछ महत्वपूर्ण कारण है देखना है की आप कितने सहमत होते हैं -

(१) पत्रकारों के अन्दर अपनी नौकरी को लेकर असुरक्षा भावना

(२) पत्रकारों का नेताओं, अफसरों से उनकी मनमाफिक खबरें प्लांट करने के लिए उपहार रिश्वत आदि ग्रहण करना

(३) चेनलों, अख़बारों के मालिकों का नेताओं , अफसरों से अपने निजी हितों के लिए ऐसा सम्बन्ध के अगर पत्रकार सामने वाले नेता अफसर के ख़िलाफ़ कुछ लिखे या ओंन स्क्रीन बोले तो नौकरी जाने का खतरा।

(४) इस बात का ख़तरा की अगर उसने अमुक नेता या अफसर के ख़िलाफ़ कुछ लिखा या ओंन स्क्रीन कुछ कहा तो उसे उस अफसर या नेता से संबंधित एक्सक्लूसिव खबरों से महरूम होना पड़गा।

(५) नेता या अफसर से अपने निजी कामों के लिए सिफारिश करवाना

मंगलवार, अक्टूबर 27

दिल्ली जो की भारत की राजधानी है, सत्ता का केन्द्र है जब यहाँ पर दीनबंधु होने का दावा करने वाले बड़े-बड़े नेतागण आम आदमी की दुःख तकलीफों की चिंता नही करते तो देश के दूर दराज़ के कोनों में क्या होता होगा इसका अंदाजा तो सहज ही लगाया जा सकता है। असल में नेताओं के लिए आम आदमी महत्वपूर्ण नही उनके लिए तो भीड़ और मुद्दे मत्वपूर्ण हैं। एक मामूली इंसान के सुख दुःख से भला इनको क्या लेना देना इसलिए सियाराम को तो सिर्फ़ झूठी आस ही दी जा सकती थी कोई सच्ची मदद नही उसका तो सिर्फ़ दिखावा होता है अगर ये चुनाव का वक्त होता तो कोई नेता सियाराम और उनके बेटे की तकलीफों का संसद में वैसे ही वर्णन करता और जार जार रोता जैसे राहुल ने विदर्भ की कलावती का वर्णन किया था और बाद में उसे उसके हाल पर छोड़ दिया, पर अफ़सोस की ये तो चुनाव वक्त भी नही तो फिर सियाराम की मदद कोई नेता या आईएस ऑफिसर क्यों करे, अरे !ये क्या मैंने तो आईएस ऑफिसर की बात कह दी - ये तो वैसे भी किसी की मदद चाह कर भी नही कर सकते क्यों ये तो पहले से ही लाल फीते से बंधे होते हैं जिसकी जकड़ बहुत मजबूत होती है जिसे ये तोड़ नही सकते। जो सरकारी तौर पर हो सकती है वो तो बेचारों से होती नही फिर मानवता के नाम पर आउट ऑफ़ वे जाकर हेल्प करने का तो सवाल ही नही उठता ।आकाल के वक्त चाहे गेहूं गोदामों में सड़ता रहे, चाहे फिर उस अनाज को चूहे खा जाएँ पर वो आकाल से पीड़ित लोगों को नही नसीब होगा । चाहे फिर आकाल से पीड़ित लोगों के मरने पर इन्हे चाहे जितनी लीपापोती करनी पड़े चाहे जितनी मोटी फाइल बनानी पड़े वो बना लेंगे पर किसी के मुंह में अनाज का एक दाना नही जाने देंगे।आप पूछते हैं की कौन बीमार है ये देश की सियाराम। ये देश बीमार नही है अगर बीमार है तो यहाँ का वो सिस्टम जो सियाराम जैसे गरीबों की मौत का कारण बनता है। देश में नक्सलवाद और माओवाद के जन्म का कारण ये लाल फीते से बंधा हुआ नौकरशाह और भ्रष्ट नेताओं का नेक्सस है जिस दिन ये टूट जाएगा, ये गला हुआ सिस्टम नष्ट हो जाएगा उसी दिन आम आदमी की गरीबी, भूख , तकलीफ से मौत होनी बंद हो जायेगी। जब तक ऐसा नही होता तब तक देश में कहीं ना कहीं मदद की आस देखता कोई दूसरा सियाराम बीमार होकर दम तोड़ता रहेगा।हाँ आपने सिया राम की मर्मस्पर्शी सच्ची कहानी सुना कर ये एहसास दिला दिया की हम लोग कितने बेबस hain ki kai baar chaha kar bhi jaruratmand ki madad nahi kar pate sirf khij kar raha jate hain

सोमवार, अगस्त 10

एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में मच्छरों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। आप सोच रहे होंगे की बैठे-बिठाये मेरे दिमाग में मच्छर क्यों भनभना रहे हैं। साहब आप का सोचना और मेरी मुर्खता को कोसना एक दम सवा सोलह आने वाजिब है। हमारा पड़ोस उत्तर प्रदेश दो नेताओं के आग्नेय वाक जाल में जल रहा है किसी की जबान जल रही है किसी का दिल जल रहा है तो किसी का मकान जल रहा है। यहाँ हमारा पड़ोस जल रहा है और दूसरी तरफ आप जैसे मुर्ख हैं जो मच्छर चिंतन में उलझे हुए हैं। इस जलन -जलन की बहस ने तो दिल्ली में कई लोगों की कई लोगों की रात की नींद और दिन का चैन छीन लिया है। ऐसा कहने वालों को मैं ये भी तो कहा सकता हूँ की भाई तेली का तेल जले तो तुम्हारे पेट में क्यों गैस बने पर मैं ऐसा नही कहूँगा क्यों की दिल्ली की आम जनता की तरह मेरा मानना भी ये ही है की चाहे पॉलिटिक्स कहीं की भी क्यों ना हो दिल्ली की जनता का उस पर बहस करने तथा अपनी राय जताने का पूरा हक है बेशक ये पढ़ कर कुछ लोग मन ही मन ये सोच रहे हों की उत्तर प्रदेश के नेताओं के दिल, मकानों और जबान में लग रही आग की चिंता वहां की राजनितिक पार्टिया करे,उन पार्टिओं का आलाकमान करें, वहां के शासन के लिए जनादेश देने वाली जनता करे भला दिल्ली के लोग वहां हो रही घटनाओं के चक्कर में अपने मगज में क्यों हड़ताल करे। भाई! आपकी बात तो ठीक है पर आपको ये बात जरुर समझनी चाहिए ये दिल्ली की जनता का ये कर्तव्य भी है और अधिकार भी की वो विभिन्न राजनितिक और कुटनीतिक मुद्दे पर एक आम राय कायम कर देश के अखिल भारतीय नेताओं की ठोस और सही निर्णय लेने में मदद करे। ये बिल्कुल उसी तरह है जैसे मुंबई वालों का बोली वुड और होली वुड में बनने वाले सिनेमा पर अपनी एक्सपर्ट राय ज़ाहिर करने का अधिकार हो। तो जैसे मुंबई वालों ने पूरे जहाँ की फ़िल्म इंडस्ट्री का ठेका लिया हुआ है उसी तरह दिल्ली वालों ने पूरे विश्व की कूटनीति और राजनीति का कांट्रेक्ट लिया हुआ है। यहाँ तो पान की दुकान पर खड़े-खड़े ही भाई लोग अफगान समस्या, फिलिस्तीनी संकट, कश्मीर और आतंकवाद जैसी समस्याओं को तो ऐसे सुलटा देते हैं जैसे ये पान खा कर पिचकारी मारने जैसा मामूली काम हो। यहाँ तो पान की दुकान पर खड़े चबीयाते और बतियाते यार लोगों का ये दावा होता है की -बंधू ! पता नही काहे को ये साले फ़ौरन सेक्रेट्री और मंत्री लोग जनता का उल्लू काटने के लिए बॉर्डर इशु, कश्मीर समस्या जैसी झाडियों को बबूल का जंगल बना देते हैं एक बार हमें केस दे कर तो देखो दो दिन में ना इन सारी समस्याओं में पलीता ना लगा दिया तो हम अपने पड़ोसी के बेटे नही। दिल्ली की बाशिंदों और मुंबईकरों का टेम्परामेंट समझने के बाद आइये हम वापस अपने मच्छर चाचा के पास उड़ चलते हैं। मच्छरों और नेताओं का एक साथ चिंतन करने के बाद मैंने कुएं की गहराई तक जा कर सोचा और पाया की इनमें तो बहुत सी समानताएं हैं जिन्हें आप भी मुलाहिज़ा फरमाइए १.बरसात के बाद सर्दी या गर्मी ख़त्म होने के बाद मच्छर चंहूँ दिशाओं में उसी तरह नजर आते हैं जैसे विधान सभा भंग होने या मध्यावधि चुनाव के वक्त नेता बिरादरी । २ जिस तरह सर्दी ख़त्म होने पर मच्छर यदा कदा नज़र आते हैं उसी तरह हारे हुए नेता तो एक बार फिर भी दिखाई दे जाते हैं पर जीते हुए नेताओं के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। ३ चुनाव नेताओं के उफान में आने का मौसम होता है तो बारिश वाली गर्मी मच्छरों के उफान में आने का मौसम होता है। ४ चुनाव जीतने के बाद नेता जनता का धन चूसते हैं तो मच्छर खून। ५ घोटाले करके जनता के खून पसीने की कमाई भ्रष्टाचार के माध्यम से चूसकर नेता जैसे लाल रुबीले हो जाते हैं उसी तरह मच्छर भी खून चूसने के बाद लाल रुबीला हो जाता है। ५ पाँच साल का समय चुकने के बाद नेता जैसे फिर जनता के पास बेशर्मी से वोट मांगने पहुँच जाता है ऐसे ही मच्छर आदमी का खून चूसने आ जाते हैं। ६ मच्छर को अदना सा मान कर मनुष्य उसे अभ्यागत मान लेता है उसी प्रकार दयालु मनुष्य नेता को नीरीह जीव मान उसे वोट दे कर जीतता है और बाद में अपनी गलती पर पछताता है। ७ वक्त आने पर नेता जैसे जनता को अपना नौकर मान कर उस पर अपना रौब गाठने लगता है। ऐसे मच्छर सेहतमंद होते ही आदमी के अस्तित्व को ही चुनौती देने लगता है। ८ मच्छर जैसे डेंगू, मलेरिया जैसी खतरनाक बीमारियों का वाहक होता है नेता भी ऐसे ही करप्शन , भाई भतीजावाद, शिफारिश जैसे रोगों का वाहक होता है। ९ नेता लोग जैसे करप्शन करके दागी होकर बड़े बड़े ओहदों के पीछे छिप जाते हैं ऐसे ही मच्छर भी खून चूस कर अंधेरे कोने में छिप जाते है। १० मच्छरों के काटने से जैसे आदमी की जिन्दगी किसी रोग की कर्ज़दार हो जाती है उसी तरह नेता से पंगा लेकर आदमी की जिन्दगी जीने जीने को मोहताज़ हो जाती है। ११ मच्छर जैसे खून चूसने के बाद मरने से पहले आदमी का खून अपने बच्चों के मुंह में लगा देता है उसी तरह नेता भी इस दुनिया से रुखसत होने से पहले अपनी लीडरी अपने बच्चों के नाम कर जाता है। १२ मच्छर जैसे भिनभिना कर आदमी को ताली पीटने के लिए मजबूर कर देते हैं ऐसे ही नेता भी झूठे भाषण देकर बड़े -बड़े नारे लगवा कर जनसमूह को ताली बजाने के लिए बाध्य कर देते हैं १३ दिल्ली के नेता जिस तरह बड़ी बड़ी कोठियों में रहते हैं उसी तरह मच्छर भी बड़े -बड़े नालों और विशाल पार्कों की घास में रहते हैं।नेताओं और मच्छरों में इतनी समानताएं देख कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ की-1 मच्छर एक दिन बड़े हो कर नेता बन जांएगे २ मच्छरों और नेताओं में खून का रिश्ता है ३ मच्छरों और नेताओं में जातीय समानता है ४ आने वाले वक्त में लोग इस बात में भेद नही कर पाएंगे की उनके ऊपर नेता राज़ कर हैं या भ्रष्टाचारी नेता ५ मच्छर और नेता दोनों ही देश के लिए हानिकारक हैं इसलिए भ्रष्ट नेताओं और मच्छरों को भागो देश बचाओ
दिल्ली भारत की राजधानी हिंदुस्तान का दिल , या यूं कहें की दिलदार रईसों का स्वर्ग । इसी स्वर्ग की सड़कों पर नर्क बहुत से गरीबों को अपनी गिरफ़्त में दबोचे पसरा पड़ा है। यहाँ एक तरफ तो ऊंची -ऊंची बिल्ड्गें हैं तो दूसरी तरफ सडांध मारते गरीब तबके के झोपडे हैं। इस शहर में गरीब और अमीर के बीच खाई इतनी गहरी और चौडी है की अब शायद ही इसे पाटना सम्भव हो और ये फर्क दिल्ली की सड़कों पर और ज्यादा दिखाई देता है जहाँ की सड़कें धनवानों की महंगी और आलिशान कारों से अटी पड़ी ट्रैफिक जाम किए रहती हैं ।उन्ही कारों के चारों तरफ मंडराते छोटे मासूम बच्चे अपने नन्हे हाथों में बेचने के लिए छोटे- मोटे सामान जैसे गुलदस्ते, अगरबत्ती के पैकेट, डायरी, पत्रिकांए अखबार आदि थामे गाड़ियों में बैठे लोगों से कुछ ना कुछ खरीद लेने की मनुहार करते नज़र आते हैं। कभी घुड़क दिए जाते हैं तो कभी कोई उनकी गरीबी पर तरस खा कर कुछ खरीद भी लेता है। सामन बिकने और हाथ में दो पैसे आ जाने की खुशी उनके चेहरे पर देखते ही बनती है। क्या ये खुशी ये संतोष किसी सेठ के एक बड़ी deal कर लिए जाने ke आत्माभिमान से क्या कुछ कम होता है?कोई भी मौसम इन्हे सड़कों पर इस तरह भटकने से नही रोक सकता। पेट की आग के सामने गर्मी की लू के थपेड़े, बरसात की झमाझम और कड़कडाती सर्दी सब बौने नज़र आते हैं। उन मौसमों में जब लोग अपने घरों से निकलना गवारा नही करते ये बच्चे आपको लाल बत्ती चौराहों पर अपने सामान का प्रचार करते नज़र आ जायेंगे । एक तो इनकी रोड पर दुकान तिस पर इनके सामन की घटिया क्वालटी भला ऐसे में सिर्फ़ ब्रांडेड सामन खरीदने वाला धनिक इनके सामन की तरफ़ क्यों आकर्षित हो ये ही कारण है की कभी किसी की फटकार तो कभी तिरस्कार तो कभी ट्रैफिक हवलदार की मार खाने के बाद भी इतनी कमाई नही हो पाती की वो अपनी कमाई से रात का खाना खा सकें। तब या तो भूखे पेट सोना पड़ता है या फिर माँ-बाप की मजदूरी से कमाए हुए पैसों से ही नसीब हो पाता है। चौराहों पर सिसकता, करहाता बचपन ना तो दिल्ली को पेरिस से भी सुंदर बनाने का सपना देखने वाली सरकार को ही नज़र आता ना ही उन उद्योगपतियों को दिखाई देता जो भारत को एक ग्लोबल ब्रांड बनाना चाहते हैं। क्या कोई ऐसा राजनितिक या औद्योगिक घराना है जिसे ये धूल-धूसरित भविष्य नज़र आता हो । अगर हाँ तो क्यों नही आगे बढ़ कर सड़क पर बिखरे इन फूलों को अपने आँचल में समेटते ताकि ये भी अपनी योग्यता से भारत के भविष्य को संवार संके

बुधवार, जून 24

ऐसे हजारों वाकयों के बावजूद जब लोग अपने आस-पास ऐसी चीज़ें होते देखते हैं जिनसे ये पता चलता हैं की दोनों मुल्कों की आवाम के बीच साझा करने को बहुत कुछ है, अपने दुःख हैं अपने सुख हैं फिर भी हम लोग एक होकर क्यों नही रहा सकते ये दोस्ती ये प्यार एक तीसरे अजनबी देश जाकर ही क्यों परवान चढ़ता है इसको साबित करने के लिए ऐसा ही एक छोटा सा किस्सा मेरे पास भी है जो मैं आप लोगों के साथ शेयर करना चाहूँगा
ये अनुभव है मेरी भाभी के फादर डॉ श्री कमल शर्मा का जो उन्होंने मेरे साथ शेयर किया और मैं आप के साथ कर रहा हूँ. ये अनुभव उनका तब का है जब वो सागर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे, सागर विश्वविद्यालय की तरफ से उन्हें किसी प्रोजेक्ट के सिलसले में लन्दन भेजा गया. जहाँ उन्हें ३ साल तक रूकना था.अनजान देश था. अजनबी लोग थे.वक़्त मुश्किल था.वहां जाकर उन्हें महसूस हुआ की अपने देश में रहना, अपने लोगों के बीच रहना कितना सुखद होता है। हलाँकि ब्रिटेन में हिन्दुस्तानियों
की कमी नहीं लेकिन ऐसा करना भी ठीक नहीं था की सड़क पर चलते किसी भी भारतीय को पकड़ कर उससे सड़क पर बात करने लगो. हाँ ये बात मन में जरुर थी की काश कोई जिस विश्विद्यालय में काम के सिलसिले में आयें हैं वहां ही कोई अपने देश का मिले. जैसे-जैसे समय बीता उनकी मनोकामना भी पूरी हुई। कुछ भारतीय उन्हीं की तरह वहां थोड़े समय के लिए आये हुए थे उन से उनकी जान पहचान भी हुई पर ये जान-पहचान कभी फौर्मल्टी के रिश्ते से आगे ना जा सकी।उसी यूनिवर्सिटी में अबुल खालिक अंसारी नाम के एक पाकिस्तानी प्रोफेसर भी थे, ये साहब यहाँ की स्थाई नागरिकता ले चुके थे। इन साहब से भी रिश्ता औपचारिक ही था।
इंग्लैंड में शर्माजी को खाने-पीने की बड़ी परेशानी थी वजह थी इंग्लैंड के बहुसंख्यक लोगों का मांसाहारी होना और शर्माजी का शुद्ध शाकाहारी होना। उन्हें शाकाहारी खाना खोजने के लिए बहुत परेशान होना पड़ता था। एक दिन वो ऐसे ही एक शाम पिज्जा रेस्ट्रोरेन्ट में जा पहुंचे वहां अबुल साहब भी मौजूद थे औपचारिक हालचाल हुआ शर्मा जी ने पिज्जा आर्डर किया इससे पहले की वो पिज्जा का टुकडा मुंह में डालते अबुल साहब लपक के उनके पास पहुंचे और बोले अरे !शर्मा जी ये आप क्या कर रहें हैं इसमें तो सूअर का मांस है शर्माजी ये सुन कर भौच्च्के रह गए। शर्माजी ने जब पिज्जा के कवर देखा तो उस पर लिखा भी था खैर शर्माजी अपना धर्म खोने से बाल-बाल बचे उन्होंने अबुल साहब का धन्येवाद किया और अपनी समस्या बताई। अबुल साहब ने मदद का भरोसा दिलाया की वो मदद करेंगे। अगले दिन अबुल साहब ने शर्मा जी को ऐसी कई जगह बताई जहाँ से शर्मा जी अपने लिए शाकाहारी खाने का जुगाड़ कर सकते थे । अबुल साहब ने शर्माजी को अपने घर आने का निमंत्रण भी दिया.शर्माजी अबुल साहब के घर गए जहाँ अबुल साहब की बीबी ने शर्माजी का काफी जोरदार इस्तकबाल किया. धीरे-धीरे जान-पहचान बढ़ती गई और फिर अच्छी खासी दोस्ती हो गई. तीन साल पंख लगा कर उड़ गए. शर्मा जी की विदाई का वक़्त नज़दीक आ गया. शर्मा जी जब भारत लौटने के लिए जब एअरपोर्ट पहुंचे तो पूरी अबुल-परिवार उन्हें विदा करने के लिए एअरपोर्ट आया. जब शर्मा जी विदा लेकर जाने लगे तो अबुल साहब ने शर्माजी का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा की काश! मुल्क का बटवारा ना हुआ होता और फिर ये भी कहा की अगर दोनों मुल्कों के बीच ये दुश्मनी की दिवार ना होती तो कम से कम हम एक दुसरे को ख़त तो लिख सकते. इस तरह दो जानी-दुश्मन देश के बाशिंदे कैसे एक दुसरे के दोस्त बन जाते हैं ये इस किस्से से पता चलता है.वैसे भी पाकिस्तान और हिंदुस्तान के बीच का झगडा तो सिर्फ राजनितिक है जिसे नेता लोग अपने-अपने फायदे के लिए हवा देते रहते हैं अगर लीडर इस तरह की हरकतें बंद कर दें तो कोई शक नहीं की ये दुश्मनी भी अपने आप ख़त्म हो जायगी

शनिवार, मई 30

हाल ही में मैं अपने दोस्त अलोक के साथ उसके घर रामनगर घुमने गया.उसके साथ उसके ऑफिस के दो लड़के भी थे.इसी दौरान हमने एकदिन नदी में नहाने का प्रोग्राम बनया.मैं अलोक, उसके दोनों दोस्त और उसके चाचा का लड़का तरुण भी हमारे साथ जाने के लिए तैयार हो गया. रामनगर कार्बेट नेशनल पार्क के काफी पास पड़ता है और जहाँ हम नहाने गए थे वो जगह भी कार्बेट पार्क का हिस्सा है। जंगल में से होकर एक नदी बहती है वहीँ हमारा नहाने का इरादा था।गाड़ी उठाई और मस्ती मारते हुए चल पड़े नदी नहाने। जैसे ही हम उस जगह के पास पहुंचे सबको अन्दर ही अन्दर शेर का डर सताने लगा लेकिन सब जवान सबको अपनी मर्दानगी पर गुमान भला कोई क्यों कर ज़ाहिर करे की उसे डर लग रहा है। अपने दोस्तों के सामने कोई चूहा बनने के लिए तैयार ही नही था। चाहे बेशक इस नकली मर्दानगी के चक्कर में जान ही क्यों ना देनी पड़े कुर्बान हो जायेंगे पर अपने क्षत्रिये वंश पर कायरता का दाग ना लगने देंगे। उतर पड़े साहब नदी नहाने। नदी घाट के नीचे से हो कर बहती थी, घाट के दुसरी तरफ़ घना जंगल और वोही साइड थी जहाँ से शेर के आने का सबसे ज्यादा खतरा था इतने में बारिश के आने के आसार भी बन गए मौसम भी ऐसा हो गया की और ज्यादा डर लगने लगा थोडी ठण्ड सी भी हो गई हम लोग नहाने लगे पर तरुण ने ठण्ड का बहाना बना कर नहाने से इंकार कर दिया लेकिन पट्ठा तो एकदम चटक बना रहा वो हमारी नहाते हुए फोटो खीचने लगा। हम लोग नहाते रहे और बन्दा तो इस जुगाड़ में लग गया की अगर खुदा ना खास्ता शेर आता है तो उसे कैसे और किस तरह जल्दी से जल्दी गाड़ी तक पहुंचना है। और थोडी देर में मैंने देखा की वो बड़े बड़े पत्थर उठा कर नदी में गिरा रहा है मैंने पूछा की क्या कर रहा है भाई तो उसका जवाब था की ऊपर आराम से पहुँचने का रास्ता बना रहा हूँ । इतने में उसे एक दूसरा और आसन रास्ता मिल गया जिससे आसानी से और जल्दी से गाड़ी तक पहुँचा जा सकता था इतने में बारिश पड़ने लगी मैं तो कुछ ठण्ड से और कुछ शेर के डर से जल्दी से नहा कर bahar निकल आया दो लोग अभी नदी में नहा ही रहे थे की तभी हमने शेर की दहाड़ सुनी पहले toh badal की गर्जना समझ कर इग्नोर किया फिर एहसास हुआ की ये बदल की गर्जना तो आसपास सेही आ रही है तब समझ में आया की जिसका डर था वो ही हुआ शेर साक्षात् मौत के रूप में कहीं पास में ही था अचानक कोई चिल्लाया भागो शेर जो जिस हालत में था वैसे ही भाग खड़ा हुआ हम एकदम साँस छोड़ कर भागे गिरते पड़ते गाड़ी तक पहुंचे डर के मारे गाड़ी भी स्टार्ट नही हो रही थी अब बारिश के साथ ओले भी पड़ने लगे ।खैर किसी तरह गाड़ी स्टार्ट हुई । घर पहुंचे भगवान् का शुक्र मनाया और इस बात का भी निश्चये किया की अब कभी झूठी बाहुदरी के चक्कर में अपनी जनन कभी खतरे में नही डालूँगा । इस घटना ने मुझे सिखाया की कभी जंगल से मजाक नही करना चाहिए .

महेंद्रजी आपकी ये बात बिल्कुल सही है की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है पर इसका ये मतलब नहीं है की इंसान की अपनी कोई वैक्तिगत इच्छा ही ना हो. समाज इंसान की निजी इच्छा के लिए सिर्फ वहां तक ही बंधनकारी होने का हक रखता है जहाँ तक की वो समाज के बाकि लोगों के लिए नुकसान दाई हो रहा हो इसके आगे हर आदमी की वैक्तिगत इच्छा ही सर्वाधिक महत्व रखती है और जहाँ तक सवाल मान्यताओं और उससे bane समाज का है तो मान्यताएं भी मनुष्यों द्वारा ही निर्मित हुई हैं अप्रासंगिक होने पर वो ही इसे ख़त्म भी करेंगे वस्तुतः ये सामजिक रीति-रिवाज़ वो नियम हैं जो समय के हिसाब से समाज को चलाने के लिए बनाये गए थे, बनाए जाते हैं और बनाए जाते रहेंगे ये नियम शाश्वत नहीं हैं ये तो मनुष्य और समय की मांग के अनुरूप बदलते रहते हैं कुछ ऐसे रीति रिवाज़ जिनकी अब जरुरत नहीं है उनका ख़तम हो जाना ही श्रेयकर है मुझे नहीं लगता की आप भी सती प्रथा का समर्थन करेंगे ये रिवाज़ तो उस काल का है जब राजपूत किसी मुस्लिम शासक या दुसरे किसी अन्य शासक के खिलाफ अपनी मारने या मर जाने की आखरी जंग लड़ते थे और अपनी पत्निओं को इस लिए सती हो जाने के लिए कहते थे ताकि उन्हें शत्रुओं के हाथों अपमानित न होना पड़े पर बताओ आज भी क्या ऐसी स्थिति है की किसी औरत के पति के मरने पर उसे अपमानित होने से बचने के लिए सती होना पड़े नहीं आज ऐसी कोई विकट स्थति नहीं है पर उसके बावजूद भी कई नासमझ लोग इस बीसवी सदी तक इस प्रथा की वकालत करते रहे भला हो राजा राममोहन राए और विल्यम बैंटिक का जिसने इस प्रथा पर १८३५ में कानूनन रोक लगवाई नहीं तो आज भी ना जाने कितने लोग अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए अपने घर की मासूम बहूओं को सती की वेदी पर बलि चढाते खैर इतना सब कहने के पीछे मेरा मकसद सिर्फ ये कहना है की उन रीति रिवाजों को अब ख़तम कर देना चाहिए जिनकी आज आवश्कता ना हो.

गुरुवार, मई 28

यहाँ तो ये कहना भी बेमाने है की दंगे रोकना और आम जनता की जानमाल की हिफाज़त करना किसी भी राज्य और केन्द्र की नैतिक जिम्मेदारी है ऐसा मै इसलिए कह रहा हूँ शायद ज्यादातर प्रबुद्धजन इस तथ्य से भली भांति परचित होंगे की जब केन्द्र में कांग्रेस सरकार थी तो उसने इंदिरा गाँधी की हत्या का बदला सिखों के खिलाफ दंगे करवा कर लिया आज भी सिख अपने समुदायके साथ हुई नाइंसाफी के लिए इंसाफ की बाट जोह रहे हैं और बीजेपी ने भी गुजरात में बहुत मत पाने के लिए, हिंदू वोटों के एकमुश्त फसल काटने के लिए राज्य प्रायोजित दंगे करवाए और मार्क्सवादी पार्टियों का तो कहना ही क्या सिंगुर और नंदीग्राम में इनकी कारगुजारिओं को कौन भूल सकता है इसलिए सरकार चाहे वो केन्द्र में हो या राज्य में हो उससे इस बात की आशा करना की वो दंगे से आमजन की रक्षा करेगी अपनेआप को मुर्ख बनाना है

अब वापिस पंजाब लौटते हैं। दूर देश वियना में दो संतों पर गोलियां चलती है वहां की पुलिस ठीक समय पर कार्रवाई भी करती है पर इस देश में संत के अनुयाई वहां की पुलिस की इमानदारी पर विश्वास ना करते हुए तोड़फोड़ की कार्रवाई शरू कर देते हैं पता नही इन दो संतों ने अपने भक्तों को क्या उपदेश दिया था पर इतना मुझे विश्वास है की ये नही कहा होगा की तुम ट्रेनों को आग लगाओ,लोगों की हत्या करो ,बसों को आग के हवाले करो। मेरे विचार से सब दुसरे अच्छे संतों की तरह इन्होने भी अपने भक्तों को भले काम करने का ही उपदेश दिया होगा पर इसके बावजूद जो लोग इन संतों के शिष्य होने के नाम पर दंगे कर रहे वो इन संतों के सच्चे शिष्य नही बल्कि गुंडे बदमाश जिनके ख़िलाफ़ प्रभावित जनता को पुलिस की राह ना देखते हुए ख़ुद एक्शन लेकर अपने क्षेत्र से इन्हे भगा देना चाहिए

बुधवार, मई 27

पंजाब में फिर से आग लग गई,पहले गुरु राम रहीम की आग में जला अब स्वामी निरंजनानन्द और स्वामी राम नन्द की आग में जल रहा है पंजाब, हो सकता है की आप में से अधिकतर लोगों को ये लगे की पंजाब में अब खुशहाली ज्यादा आ गई जिसे पंजाब वाले अब पचा नहीं पा रहे इसलिये अब दंगा कर रहे हैं, हो सकता है की काफी लोगों को इस तर्क में दम ना नज़र आये और वो इसकी बजाये ये मानते हों की नहीं भाई, पंजाब तो महराष्ट्र से कॉम्पिटिशन की आग में जल रहा है की भाई दंगे करने और कराने में भला वो पीछे कैसे रह सकता अरे जब तरक्की की रास्ते में सब से आगे है तो फिर इसी फील्ड में मार क्यों खानी है आप कुछ भी सोचें लेकिन सच तो ये ही है की जल रहा है पंजाब आप शायद ये भी कहें की पंजाब के तो ग्रह ही ख़राब हैं तभी तो एक के बाद एक नई मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है पंजाब को। कहा जा रहा है की जिन लोगों ने इन दोनों संतों पर गोलियां चलाई हैं उनसे बदला ले रहे हैं दंगाई लेकिन कोई बसों में आग लगाने वाला, रेलों को नुक्सान पहुँचाने वाला मुझ ना समझ को ये तो समझाए की भाई गोली तो इन संतों को वियना में मारी गई इस में पंजाब में रहने वालों और दुसरे राज्यों से आने वाले मासूम नागरिकों से ऐसा क्या अपराध हो गया की इन संतों के अनुयाईओं ने इन्हे भी बराबर का दोषी मान कर दण्डित करना शुरू कर दिया इस देश और राज्य पर शासन करने वाले महान नेता कहाँ मुह छिपा कर सो रहे हैं की उन्हें इस सामान्य से तथ्य का का आभास नही की इन दंगों में वो लोग ही पिस रहे हैं जिनका इस सब से कुछ लेना देना नही है आख़िर लोगों ने तो ये ही सोचकर वोटिंग की थी न की सरकार दंगों या इसके जैसी किसी अन्य विपत्ति से उनकी सुरक्छा करेगी सरकार पर वो तो मारने वाले हाथ को पकड़ने की बजाये मार खाने वालों के मरहम लगा रही है की बेटा ठीक होने के बाद फिर मार खाने के लिए तैयार हो जाओ आख़िर कब चेतेगी सरकार ?

सोमवार, मई 11

"इज्ज़त बेटी से बड़ी नहीं" इस लाइन का मतलब मुझे समझ नहीं आया. क्योंकि पूरी कहानी का मूल स्वर तो कुछ और ही कह रहा है शायद लेखक ये कहना चाहता है की "इज्ज़त बेटी से बड़ी होती और इसी इज्ज़त को कायम रखने के लिए लोग अपनी बेटी की बलि चढाने से भी नहीं हिचकचाते.ख़ैर मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ की इस तरह की बर्बरता पूर्ण कार्रवाई सभ्य और खुले लोकतान्त्रिक समाज के लिए कलंक है पर क्या आप ने कभी इस बात पर ध्यान दिया की इस तरह की ज्यादातर घटनाएं गाँव देहातों में ज्यादा घटती हैं क्यों की वहां के समाज में हर एक आदमी अपनी आप को समाज पर निर्भर पाता है और वो समाज के प्रति भी संवेदनशील रहता है और खुद भी इस बात से अवेअर रहता है की उसके आसपास घट क्या रहा है. हर समाज की अपनी कुछ मान्यताएं होती हैं और उस समाज से जुड़ा हुआ हर आदमी ना सिर्फ उन परम्पराओं की इज्ज़त करता है बल्कि उन परम्पराओं के प्रति वफादार भी होता है जिन्हें हम रीति-रिवाज़ भी कह देते है कुछ रीति रिवाज़ अच्छे भी होते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जो आज के समय के हिसाब से आप्रसंगिक हो चुके होते हैं और जो अब एक बुराई बन चुके होते हैं पर समाज के लोग उन्हें अपने पुरखों की थाती मान कर उन्हें अपने सीने से उसी तरह चिपकाए रहते हैं जिस तरह से कोई बंदरिया अपने मरे हुए बच्चे को अपने सीने से चिपकाए रखती है और जब कोई उस मरे हुए बच्चे को उससे छीनने की कोशिश करता है तो बंदरिया उस व्यक्ति के ऊपर जानलेवा हमला कर देती है. उसी तरह जब कोई व्यक्ति या समूह उन सडी गली मान्यताओं को तोड़ने या झकझोरने की कोशिश करता है तो पूरा का पूरा समाज ही उसके खिलाफ खड़ा हो जाता है यहाँ तक उसके परिवार के लोग भी.जैसा की विवेक जी ने अपने लेख में लिखा है. समाज क्योंकि एक सिस्टम का नाम है और समाज एक मशीन की भांति काम करता है, मशीन के अन्दर भावनाएं नहीं होती वो अपने खिलाफ जाने वाले को निर्ममतापूर्वक कुचलता है ऐसे में किसी लड़की की बिरादरी की और परिवार की इज्ज़त के नाम पर हत्या हो जाना कोई अचरज की बात नहीं है.अब बात भारतीय समाज की तालिबान से तुलना की.तालिबान ने अफगानिस्तान में धर्म के नाम पर इतना कहर बरपाया है की बौद्धिक वर्ग को कहीं भी इस से मिलती जुलती घटना मिलने पर इस से कम या इससे ज्यादा तुलना करने का मन करने लगता है वो जरा भी इस बात पर ध्यान देने की कोशिश नहीं करते की हमारे देश में इस तरह की घटनाएं यदा कदा घटती है जबकि अफगानिस्तान में तालिबान के राज में इस तरह की घटनाएं रोज़ घटती थी और स्वात और बुनेर और जहाँ -जहाँ तालिबान जैसे कट्टरपंथी तत्वों का कब्ज़ा है वहां इस तरह घटनाएं होती रहती हैं और इसकी आशंका भी बनी रहती है तो फिर भारतीय समाज और तालिबान के कब्जे वाले अफगानिस्तान में भला किस तरह की तुलना हो सकती है?

शनिवार, अक्टूबर 4

पता नही क्यों देश के नेता जनता के नेता न होकर सिर्फ़ अपने नेता बनकर रह गए सिर्फ़ अपनी सफलता की राह ही इन्हे समझ में आती है जनता को रास्ता खुशहाली का कौन दिखायेगा ?