ऐसे हजारों वाकयों के बावजूद जब लोग अपने आस-पास ऐसी चीज़ें होते देखते हैं जिनसे ये पता चलता हैं की दोनों मुल्कों की आवाम के बीच साझा करने को बहुत कुछ है, अपने दुःख हैं अपने सुख हैं फिर भी हम लोग एक होकर क्यों नही रहा सकते ये दोस्ती ये प्यार एक तीसरे अजनबी देश जाकर ही क्यों परवान चढ़ता है इसको साबित करने के लिए ऐसा ही एक छोटा सा किस्सा मेरे पास भी है जो मैं आप लोगों के साथ शेयर करना चाहूँगा
ये अनुभव है मेरी भाभी के फादर डॉ श्री कमल शर्मा का जो उन्होंने मेरे साथ शेयर किया और मैं आप के साथ कर रहा हूँ. ये अनुभव उनका तब का है जब वो सागर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे, सागर विश्वविद्यालय की तरफ से उन्हें किसी प्रोजेक्ट के सिलसले में लन्दन भेजा गया. जहाँ उन्हें ३ साल तक रूकना था.अनजान देश था. अजनबी लोग थे.वक़्त मुश्किल था.वहां जाकर उन्हें महसूस हुआ की अपने देश में रहना, अपने लोगों के बीच रहना कितना सुखद होता है। हलाँकि ब्रिटेन में हिन्दुस्तानियों
की कमी नहीं लेकिन ऐसा करना भी ठीक नहीं था की सड़क पर चलते किसी भी भारतीय को पकड़ कर उससे सड़क पर बात करने लगो. हाँ ये बात मन में जरुर थी की काश कोई जिस विश्विद्यालय में काम के सिलसिले में आयें हैं वहां ही कोई अपने देश का मिले. जैसे-जैसे समय बीता उनकी मनोकामना भी पूरी हुई। कुछ भारतीय उन्हीं की तरह वहां थोड़े समय के लिए आये हुए थे उन से उनकी जान पहचान भी हुई पर ये जान-पहचान कभी फौर्मल्टी के रिश्ते से आगे ना जा सकी।उसी यूनिवर्सिटी में अबुल खालिक अंसारी नाम के एक पाकिस्तानी प्रोफेसर भी थे, ये साहब यहाँ की स्थाई नागरिकता ले चुके थे। इन साहब से भी रिश्ता औपचारिक ही था।
इंग्लैंड में शर्माजी को खाने-पीने की बड़ी परेशानी थी वजह थी इंग्लैंड के बहुसंख्यक लोगों का मांसाहारी होना और शर्माजी का शुद्ध शाकाहारी होना। उन्हें शाकाहारी खाना खोजने के लिए बहुत परेशान होना पड़ता था। एक दिन वो ऐसे ही एक शाम पिज्जा रेस्ट्रोरेन्ट में जा पहुंचे वहां अबुल साहब भी मौजूद थे औपचारिक हालचाल हुआ शर्मा जी ने पिज्जा आर्डर किया इससे पहले की वो पिज्जा का टुकडा मुंह में डालते अबुल साहब लपक के उनके पास पहुंचे और बोले अरे !शर्मा जी ये आप क्या कर रहें हैं इसमें तो सूअर का मांस है शर्माजी ये सुन कर भौच्च्के रह गए। शर्माजी ने जब पिज्जा के कवर देखा तो उस पर लिखा भी था खैर शर्माजी अपना धर्म खोने से बाल-बाल बचे उन्होंने अबुल साहब का धन्येवाद किया और अपनी समस्या बताई। अबुल साहब ने मदद का भरोसा दिलाया की वो मदद करेंगे। अगले दिन अबुल साहब ने शर्मा जी को ऐसी कई जगह बताई जहाँ से शर्मा जी अपने लिए शाकाहारी खाने का जुगाड़ कर सकते थे । अबुल साहब ने शर्माजी को अपने घर आने का निमंत्रण भी दिया.शर्माजी अबुल साहब के घर गए जहाँ अबुल साहब की बीबी ने शर्माजी का काफी जोरदार इस्तकबाल किया. धीरे-धीरे जान-पहचान बढ़ती गई और फिर अच्छी खासी दोस्ती हो गई. तीन साल पंख लगा कर उड़ गए. शर्मा जी की विदाई का वक़्त नज़दीक आ गया. शर्मा जी जब भारत लौटने के लिए जब एअरपोर्ट पहुंचे तो पूरी अबुल-परिवार उन्हें विदा करने के लिए एअरपोर्ट आया. जब शर्मा जी विदा लेकर जाने लगे तो अबुल साहब ने शर्माजी का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा की काश! मुल्क का बटवारा ना हुआ होता और फिर ये भी कहा की अगर दोनों मुल्कों के बीच ये दुश्मनी की दिवार ना होती तो कम से कम हम एक दुसरे को ख़त तो लिख सकते. इस तरह दो जानी-दुश्मन देश के बाशिंदे कैसे एक दुसरे के दोस्त बन जाते हैं ये इस किस्से से पता चलता है.वैसे भी पाकिस्तान और हिंदुस्तान के बीच का झगडा तो सिर्फ राजनितिक है जिसे नेता लोग अपने-अपने फायदे के लिए हवा देते रहते हैं अगर लीडर इस तरह की हरकतें बंद कर दें तो कोई शक नहीं की ये दुश्मनी भी अपने आप ख़त्म हो जायगी
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