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ya! its me

गुरुवार, अक्टूबर 29

इस मर्मस्पर्शी करुणाजनक कहानी के मध्य एक और तथ्य उभर कर सामने आता है और सोचने को विवश करता है- पत्रकारों की वर्तमान दशा, कल जिस पत्रकार(महात्मा गाँधी, मदन मोहन मालवीय, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि) से डर कर अँगरेज़ पहले आवश्यक सुधार करने और बाद में जिनकी वजह से देश से भागने पर मजबूर हुए आज उसी पत्रकार की हालत ये हो गई है की जायज़ काम करवाने के लिए भी उसको अफसरों और नेताओं के सम्मुख मिमयाना पड़ता है । आख़िर इस तरह गुठनेt टेकने की वजह क्या है मेरी नज़र में कुछ महत्वपूर्ण कारण है देखना है की आप कितने सहमत होते हैं -

(१) पत्रकारों के अन्दर अपनी नौकरी को लेकर असुरक्षा भावना

(२) पत्रकारों का नेताओं, अफसरों से उनकी मनमाफिक खबरें प्लांट करने के लिए उपहार रिश्वत आदि ग्रहण करना

(३) चेनलों, अख़बारों के मालिकों का नेताओं , अफसरों से अपने निजी हितों के लिए ऐसा सम्बन्ध के अगर पत्रकार सामने वाले नेता अफसर के ख़िलाफ़ कुछ लिखे या ओंन स्क्रीन बोले तो नौकरी जाने का खतरा।

(४) इस बात का ख़तरा की अगर उसने अमुक नेता या अफसर के ख़िलाफ़ कुछ लिखा या ओंन स्क्रीन कुछ कहा तो उसे उस अफसर या नेता से संबंधित एक्सक्लूसिव खबरों से महरूम होना पड़गा।

(५) नेता या अफसर से अपने निजी कामों के लिए सिफारिश करवाना

मंगलवार, अक्टूबर 27

दिल्ली जो की भारत की राजधानी है, सत्ता का केन्द्र है जब यहाँ पर दीनबंधु होने का दावा करने वाले बड़े-बड़े नेतागण आम आदमी की दुःख तकलीफों की चिंता नही करते तो देश के दूर दराज़ के कोनों में क्या होता होगा इसका अंदाजा तो सहज ही लगाया जा सकता है। असल में नेताओं के लिए आम आदमी महत्वपूर्ण नही उनके लिए तो भीड़ और मुद्दे मत्वपूर्ण हैं। एक मामूली इंसान के सुख दुःख से भला इनको क्या लेना देना इसलिए सियाराम को तो सिर्फ़ झूठी आस ही दी जा सकती थी कोई सच्ची मदद नही उसका तो सिर्फ़ दिखावा होता है अगर ये चुनाव का वक्त होता तो कोई नेता सियाराम और उनके बेटे की तकलीफों का संसद में वैसे ही वर्णन करता और जार जार रोता जैसे राहुल ने विदर्भ की कलावती का वर्णन किया था और बाद में उसे उसके हाल पर छोड़ दिया, पर अफ़सोस की ये तो चुनाव वक्त भी नही तो फिर सियाराम की मदद कोई नेता या आईएस ऑफिसर क्यों करे, अरे !ये क्या मैंने तो आईएस ऑफिसर की बात कह दी - ये तो वैसे भी किसी की मदद चाह कर भी नही कर सकते क्यों ये तो पहले से ही लाल फीते से बंधे होते हैं जिसकी जकड़ बहुत मजबूत होती है जिसे ये तोड़ नही सकते। जो सरकारी तौर पर हो सकती है वो तो बेचारों से होती नही फिर मानवता के नाम पर आउट ऑफ़ वे जाकर हेल्प करने का तो सवाल ही नही उठता ।आकाल के वक्त चाहे गेहूं गोदामों में सड़ता रहे, चाहे फिर उस अनाज को चूहे खा जाएँ पर वो आकाल से पीड़ित लोगों को नही नसीब होगा । चाहे फिर आकाल से पीड़ित लोगों के मरने पर इन्हे चाहे जितनी लीपापोती करनी पड़े चाहे जितनी मोटी फाइल बनानी पड़े वो बना लेंगे पर किसी के मुंह में अनाज का एक दाना नही जाने देंगे।आप पूछते हैं की कौन बीमार है ये देश की सियाराम। ये देश बीमार नही है अगर बीमार है तो यहाँ का वो सिस्टम जो सियाराम जैसे गरीबों की मौत का कारण बनता है। देश में नक्सलवाद और माओवाद के जन्म का कारण ये लाल फीते से बंधा हुआ नौकरशाह और भ्रष्ट नेताओं का नेक्सस है जिस दिन ये टूट जाएगा, ये गला हुआ सिस्टम नष्ट हो जाएगा उसी दिन आम आदमी की गरीबी, भूख , तकलीफ से मौत होनी बंद हो जायेगी। जब तक ऐसा नही होता तब तक देश में कहीं ना कहीं मदद की आस देखता कोई दूसरा सियाराम बीमार होकर दम तोड़ता रहेगा।हाँ आपने सिया राम की मर्मस्पर्शी सच्ची कहानी सुना कर ये एहसास दिला दिया की हम लोग कितने बेबस hain ki kai baar chaha kar bhi jaruratmand ki madad nahi kar pate sirf khij kar raha jate hain