शनिवार, अगस्त 28
हाय ये धर्म की दुकानदारी
लाजपत नगर रिंग रोड से मुझे अक्सर निकलना होता है कई सालों से मैं वहां से जा रहा हूँ। टाइम पास करने के लिए अक्सर मैं खिड़की के पास की सीट को प्राथमिकता देता हूँ। रोज वही सब देखता था पर ऐसा नहीं है कि जो रोज देखता था उसमे कोई बदलाव ही नहीं आता था बिलकुल आता था रोज सड़क पर मुझे तरक्की का नज़ारा मुझे रोज देखने को मिलता था। लाजपत नगर मार्केट के पास रिंग रोड से लगे हुए दो मंदिर थे। जितनी तरक्की मैंने इन दो मंदिरों की देखि उतनी तेज प्रोग्रेस मैंने कभी किसी की नहीं मेंरे देख ते देखते दोनों मंदिर, मंदिर से कब दुकानों में तब्दील हो गए मुझे पता ही नहीं चला। यदि आपको भी ये चमत्कार देखना तो आप भी जा कर देख सकते हो
गुरुवार, जून 24
खाप पंचायते उनके फैसले और समाज पर उनका असर
ललित मोदी का बी सी सी आई को खाप पंचायत बताना ये बता गया कि हर आम ओ खास में खाप पंचायतों के कि कारगुजारियों का खौफ किस कदर हावी हो रहा है। शायद कुछ दिनों बाद ये बात मुहावरे के रूप में भी कही जाने लगे। हर वो बात जिसमें ऐसा संदेह हो कि किसी ग्रुप या विशेष जन का अमुक निर्णय सनकपने या दकियानूसीपने की हद के आसपास है या फिर ऐसा डिसीजन जिससे बिना वजह क़ानून को चुनोती मिल रही हो तो थोड़ी ठीक सी अकल रखने वाला अपने आप से या किसी दुसरे से ये ही कहेगा की यार फलाने की सोच तो बिलकुल खाप पंचायेती सोच है देखो तो क्या सनकी डिसीजन लिया इसने की पूरा का पूरा घर बर्बाद हो जायेगा इसका । ये तो बात हुई की कैसे मुहावरों का जन्म होता है अब बात करते हैं की किन कारणों ने तथाकथित न्याय पंचायतों के लगभग अनपढ़ न्यायधिशों को कहाँ से इस बात की प्रेरणा दी वो विस्मयकरी निजी स्वतंत्रा को अघात पहुंचाने वाले फतवे दे सकें। इनके सबसे पहले प्रेरणा स्रोत तो इस्लाम की व्याख्या करने वाले वो उलेमा वर्ग है जो अपने फतवों को क़ानून,देश और सरकार से भी ऊपर मानते हैं। इनके पास भी कारण है अपने फतवों के ऊपर मानने क्यों की ये फतवा देने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि एक आम मुस्लिम धर्मभीरू है और धर्म को सर्वोच्च मानता है ऐसे में कई बार उलेमा अपने मुस्लिम समाज में सस्ती लोकप्रियता अर्जित करने के लिए जानबूझ कर देश के कानून से टकराने वाले फतवे देते हैं ताकि मीडिया में वो चर्चा का विषयबन सकें और मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग भी इनके फतवों को समर्थन करता है । अक्सर देखा गया है कि इस तरह के फतवे उदारवाद और आधुनिकता के विरोधी होते हैं. ये तो हुआ प्रेरणा स्रोत नो १ अब बात करतें हैं राजस्थान में हुए गूजरों के आरक्षण आन्दोलन कि जिसमे गुजरों कि महापंचायत ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक तरह से ये पंचायत गुजरों कि शक्ति का प्रतीक थी जिसने राजस्थान की सरकार को गुजरों की मांग के आगे झुकने के लिए मजबूर कर दिया था। अब इन पंचायतों को अपनी इस शक्ति का अहस्सा हो चूका था। इसलिए ये पंचायेतें अब ऐसे आदेश जारी कर रही हैं जिनको देते समय सुप्रीम कोर्ट भी १० बार सोचे। अगर समय रहते इस तरह कि तमाम पंचायतों को काबू नहीं किया गया तो वक़्त दूर नहीं हैं जब देश में कानून का शासन और सरकार कि सत्ता ख़त्म हो जाएगी
शनिवार, जून 5
कुछ दिनों पहले शीला दीक्षित ने कॉमन वेल्थ गेम्स से पहले दिल्ली में ऑटो रिक्शा को बैन कर देना चाहिए ऐसा बयान दिया था। ऑटो रिक्शा वालों ने शीला दीक्षित के उस बयान का बड़ा ही जबरजस्त विरोध किया था। विरोध लाज़मी भी था भाई किसी के पेट पर लात मारोगे तो चिल्लाएगा तो जरूर। मुझे शुरू -शुरू में तो मुख्यमंत्री के इस बयान पर काफी गुस्सा आया की भाई अगर सड़क से ऑटो हटा दिए तो इन ऑटो वालों का जो होगा वो तो होगा ही दिल्ली की उस जनता का क्या होगा जिसके पास अपनी खुद की सवारी नहीं है । एक तो पहले ही ऑटो वालों पर फाइनेंस माफिया की मार पड़ रही। उस पर शीला दीक्षित का ये बयान तो कोढ़ में खाज जैसा दिखाई देने लगा । सरकार ने तो बसों के किराए पहले ऐसे बढ़ा दिए थे की पहले से दिल्ली की आम जनता को ऐसा लगने लगा था की सरकार बस में बैठा कर हम से ऑटो का किराया मांग रही है। तो दिल्ली की जनता ने भी सोचा की जब सरकार बस से ऑटो का किराया ही वसूलना चाहती है तो क्यों न फिर ऑटो रिक्शा का ही इस्तेमाल किया जाये।
अब सरकार ऑटो को ही रोड से हटाने की बात करने लगी है । इन दिनों इस समस्या के बारे में सोच ही रहा था की एक दो ऐसे हादसे हुए की जिसने ये विश्वास दिलाया की शीला दीक्षित जी का निर्णय बिलकुल सही था।
जब जब ऑटो वालों से रोड पर सामना हुआ इन्होने ने मुझे लोहे के चने चबवा दिए। जब किसी ऑटो वाले को कही चलने के लिए कहता तो वो ऐसा किराया मांगता जैसे मैंने उसे चाँद पर चलने के लिए कह दिया हो। और अगर मैं कहता की भाई ये तो बहुत ज्यादा मांग रहे हो तो वो तुरंत गैस खतम हो जाने की घोषणा कर देता और ये रवैय्या किसी एक ऑटो वाले का नहीं कामोवेश सभी ऑटो वाले इसी फार्मूले को अप्प्लाई कर रहे हैं फिर मजबूरी में भैया से उनकी मोटर सायकल लेकर जब भी अपने गंतव्य की तरफ निकला तो मैंने पाया की ऑटो वाले भी ऑटो के हैंडल और मोटर साइकल के हैंडल में जातीय साम्यता होने के वजह से ऑटो को भी मोटर साइकल समझ कर चला रहे हैं जिधर मन हो रहा है उधर ही मोड़ ले रहे हैं । उनके ऑटो चलाने के इस खतरनाक तरीके की वजह से दो तीन बारी तो मैं ही मरने से बाल- बाल बचा। इन घटनाओं से सबक लेकर मुझे ये समझ में आया की सरकार के सारे फैसले जनहित विरोधी नहीं होते कुछ फैसले तात्कालिक नुक्सान करने वाले जरुर दिखाई देते हैं लेकिन उन निर्णयों में दूर की भलाई छिपी होती है । अब मैं इस मामले में sheela dikshit ji ke साथ हूँ आप क्या कहते हो दिल्ली वालों सड़क में दुर्घटना में मरना है या बसों में ज्यादा किराया दे कर शाम को सही सलामत घर लौटना है निर्णय आपके हाथ में है
अब सरकार ऑटो को ही रोड से हटाने की बात करने लगी है । इन दिनों इस समस्या के बारे में सोच ही रहा था की एक दो ऐसे हादसे हुए की जिसने ये विश्वास दिलाया की शीला दीक्षित जी का निर्णय बिलकुल सही था।
जब जब ऑटो वालों से रोड पर सामना हुआ इन्होने ने मुझे लोहे के चने चबवा दिए। जब किसी ऑटो वाले को कही चलने के लिए कहता तो वो ऐसा किराया मांगता जैसे मैंने उसे चाँद पर चलने के लिए कह दिया हो। और अगर मैं कहता की भाई ये तो बहुत ज्यादा मांग रहे हो तो वो तुरंत गैस खतम हो जाने की घोषणा कर देता और ये रवैय्या किसी एक ऑटो वाले का नहीं कामोवेश सभी ऑटो वाले इसी फार्मूले को अप्प्लाई कर रहे हैं फिर मजबूरी में भैया से उनकी मोटर सायकल लेकर जब भी अपने गंतव्य की तरफ निकला तो मैंने पाया की ऑटो वाले भी ऑटो के हैंडल और मोटर साइकल के हैंडल में जातीय साम्यता होने के वजह से ऑटो को भी मोटर साइकल समझ कर चला रहे हैं जिधर मन हो रहा है उधर ही मोड़ ले रहे हैं । उनके ऑटो चलाने के इस खतरनाक तरीके की वजह से दो तीन बारी तो मैं ही मरने से बाल- बाल बचा। इन घटनाओं से सबक लेकर मुझे ये समझ में आया की सरकार के सारे फैसले जनहित विरोधी नहीं होते कुछ फैसले तात्कालिक नुक्सान करने वाले जरुर दिखाई देते हैं लेकिन उन निर्णयों में दूर की भलाई छिपी होती है । अब मैं इस मामले में sheela dikshit ji ke साथ हूँ आप क्या कहते हो दिल्ली वालों सड़क में दुर्घटना में मरना है या बसों में ज्यादा किराया दे कर शाम को सही सलामत घर लौटना है निर्णय आपके हाथ में है
सोमवार, मार्च 1
नक्सलवादी चाहे ये दावा करें कि वो जनता के हित के लिए हथियार उठाये हुए हैं पर इस बात से वो चाह कर भी इनकार नहीं कर सकते कि इनकी गोली से चाहे पुलिस का आदमी मरे, मुखबिर मरे या फिर आम आदमी हैं तो सारे इसी समाज का हिस्सा सारे आपस में किसी ना किसी तरह इंटरकनेक्टेड हैं। नक्सलवादी कहते हैं कि उन्होंने सरकार के अन्याय के खिलाफ आवाज और हथियार उठाया है पर मैं कहता हूँ कि सरकार से भी अत्याचारी तो ये खुद हैं । आखिर किसने इन्हें अपने हक कि लड़ाई लड़ने के लिए नियुक्त किया है और यदि किसी ने किया भी हैं तो इससे इन्हें मनमाफिक हत्याएं करने का लाइसेंस नहीं मिल जाता ये अपनी बहादुरी ऐसे लोग पर दिखाते पास अपने नून रोटी का जुगाड़ सोचने से अहम् मुद्दा कुछ नहीं होता।
शनिवार, फ़रवरी 27
माओवाद कितना सच कितना झूठ
चिदम्बरम जी ने जब से नक्सलवादियों, माओवादियों के खिलाफ़ जंग का ऐलान किया है तब से माओ वादियों के हमले पहले से और तेज हो गए हैं ।शायद ये नक्सलवादी ग्रहमंत्री के फ़ोलादी इरादों से कुछ इस कदर डर गए हैं कि उन्हें अब अपना अंत निकट दिखाई दे रहा है इसलिए वो अधिक से अधिक हत्याएं करके आम जनमानस को डरा कर सरकार के इरादों को शिथिल करना चाहते हैं। माओवादी प्रत्यक्ष रूप से तो सिर्फ उन्ही लोगों कि हत्याएं कर रहे हैं जो किसी ना किसी रूप से सरकार से जुड़े हैं। ज्यादातर या तो पुलिस वाले, सुरक्षा बल के जवान या फिर नक्सलियों द्वारा करार दे के मार दिए जाने वाले मुखबिर हैं। इनके बीच में पिस रहे हैं आम लोग जिनका कोई भी कसूर नही है जबकि नक्सल वादियों का ये ही दावा है कि वो जो लड़ाई लड़ रहे हैं वो जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं। ये ऐसे कौन से आधिकार हैं जिन्हें आम जनता के लिए पाने के लिए आम जनता को ही मारा जा रहा है।आगे जारी....
मंगलवार, फ़रवरी 16
शुक्रवार, फ़रवरी 12
अपनी पिछली पोस्ट मैं में मैंने गंगा में हो रहे प्रदूषण के मुद्दे पर मीडिया की भूमिका की बात की थी इस मामले में कभी भी मीडिया ने सकारात्मक काम नही किया अभी भी वो इस मुद्दे को भुना ही रहा है। जब तक कुम्भ शुरू नही हुआ तभी तक मीडिया की नज़र में गंगा में प्रदुषण था । जैसे ही कुम्भ शुरू हुआ मीडिया को इस से संबंधित अन्य मनोरंजक सामग्री मिल गई इसलिए कुम्भ ख़तम होने तक ये चलेगा और उसके बाद तो गंगा मैया मीडिया से ओझल ही हो जाएगी ...................
गुरुवार, फ़रवरी 4
भ्रष्टाचार की गंगा
तो स्टोरी को आगे लेकर चलते हैं -जैसा की मैंने पहले ही बताया कि गंगा अब लोगों कि नजर में चढ़ चुकी थी कई सारे स्वयंसेवी सगठनों ने गंगा कि रक्षा के लिए अवतार ले लिया था। जिन्हें सरकार से गंगा कि सफाई के नाम पर मनमाफिक ग्रांट मिल रही थी ऐसे में गंगा कि सफाई का स्वांग भरने में भला बुराई ही क्या थी । अभी इस ढकोसले में एक बड़े खिलाड़ी का आना बाकि था और उस खिलाड़ी का नाम था विश्वा हिन्दू परिषद् , स्वघोषित हिन्दुओं का सबसे बड़ा हितैषी। गंगा ,गौ की रक्षा की कसम खाने वाले इस संगठन ने सच में गंगा को बचाने के लिए एक बहुत बड़े आन्दोलन का सूत्रपात किया काफी हद तक दूसरों के मुकाबले अपने अभियान में इसे सफलता भी मिली माँ गंगा के भक्तों के दिलों में इस संगठन ने जगह भी बनाई। अभी पूरी सफलता मिली भी नहीं थी किराम मंदिर आन्दोलन का वक़्त आ गया ,गंगा बचाओ आन्दोलन से मिली सफलता को इस संगठन ने राम मंदिर मुद्दे में भुनाया और अब गंगा को बचाना छोड़ कर राम मंदिर बनवाने लगे। बीजेपी को सत्ता कि सीढ़ी चढ़वाने लगे। इस तरह से विश्वा हिन्दू परिषद ने गंगा का इस्तेमाल सिर्फ प्रसिद्धी पाने के लिए किया। अब बाबा रामदेव कि बारी है वो भी लोगों को गंगा को बचाने के लिए गोलबंद कर रहे हैं । कुम्भ का वक़्त है गंगा में सिर्फ नाक डूबा कर डूब मरने का ही पानी बचा है । हरिद्वार में तमाम भारत के साधू संत जमा हो रहे हैं देखें क्या होता है अभी मैंने बाबा रामदेव कि बात उपर की थी। भाई सेलिब्रेटी आदमी हैं मीडिया उनके साथ है शायद अब की बार कुछ चमत्कार हो ही जाए लकिन मुझे ना जाने क्यों लगता है की वो सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए ही इस मुद्दे को हवा दे रहे हैं जहाँ तक इलेक्ट्रोनिक मीडिया का सवाल हैं तो भाई यहाँ जो दिखता है वो ही बिकता है मिडिया जानती है की आम हिन्दू जनमानस गंगा से बहुत ही गहरे भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है इस लिए इस गंगा में हो रहे प्रदूषण तथा सरकार की लापरवाही पर कार्यक्रम बना कर आसानी से काफी साडी एड और टी। र पी बटोरी जा सकती है। अब कुछ विराम देता हूँ इस मुद्दे पर हम आगे बात करेंगे। जारी...........
मंगलवार, फ़रवरी 2
भ्रष्टाचार को गाली देना और गंगा को बचाने की वकालत करना आज के जमाने का फैशन सा हो गया है। जिसे देखो वही माननीय भ्रष्टाचार को मार भगाने और गंगा को बचा लेने की दुहाई देता नज़र आता है। आप भी बोलेंगे कि भाईसाब आप को तो हर बात में मीन मेख निकालने की आदत है आप की सोच ही नकारात्मक है हर अच्छे काम और उस काम को करने वाले को आप शक्क की निगाह से देखते हैं ये कोई अच्छी बात तो नही है तो मेरा जवाब होगा भैया मैं भी ये ही मानना चाहता हूँ की आप सही हों और मैं गलत, पर मैं क्या करूँ इतिहास हमेशा ही ऐसे मामलों में सकारात्मक रूख के साथ उम्मीद का दामन थामने वालों को गलत ठहराता आया है। अगर आप को विश्वास न हो तो आईये हम इतिहास के पन्नों में ही जाकर झाँक लें की इतिहास क्या कहता है । आज से कई साल पहले राजीव गाँधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए गंगा को बचाने की मुहिम शुरू की थी। गंगा को साफ़ करने के लिए प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के लिए बहुत बड़ी रक़म जारी की थी पर हाल वही ढाक के तीन पात रहा। उस समय के प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के मेम्बरों के परिवार तर गए पर गंगा मैली की मैली रह गई। हाँ राजीव गाँधी की मुहिम ने इतना रंग जरुर दिखाया की लोगों की नज़र में गंगा चढ़ गई । उसके बाद तो गंगा को बचाने वालों का ताँता सा लग गया। इधर सरकार गंगा लगातार ख़राब हो रही हालत पर घड़ियाली आंसू बहाती उधर जगह -जगह गंगा पर बाँध बना कर सरकार गंगा का गला घोटने की कोशिश करती। आगे जारी
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