इस मर्मस्पर्शी करुणाजनक कहानी के मध्य एक और तथ्य उभर कर सामने आता है और सोचने को विवश करता है- पत्रकारों की वर्तमान दशा, कल जिस पत्रकार(महात्मा गाँधी, मदन मोहन मालवीय, गणेश शंकर विद्यार्थी आदि) से डर कर अँगरेज़ पहले आवश्यक सुधार करने और बाद में जिनकी वजह से देश से भागने पर मजबूर हुए आज उसी पत्रकार की हालत ये हो गई है की जायज़ काम करवाने के लिए भी उसको अफसरों और नेताओं के सम्मुख मिमयाना पड़ता है । आख़िर इस तरह गुठनेt टेकने की वजह क्या है मेरी नज़र में कुछ महत्वपूर्ण कारण है देखना है की आप कितने सहमत होते हैं -
(१) पत्रकारों के अन्दर अपनी नौकरी को लेकर असुरक्षा भावना
(२) पत्रकारों का नेताओं, अफसरों से उनकी मनमाफिक खबरें प्लांट करने के लिए उपहार रिश्वत आदि ग्रहण करना
(३) चेनलों, अख़बारों के मालिकों का नेताओं , अफसरों से अपने निजी हितों के लिए ऐसा सम्बन्ध के अगर पत्रकार सामने वाले नेता अफसर के ख़िलाफ़ कुछ लिखे या ओंन स्क्रीन बोले तो नौकरी जाने का खतरा।
(४) इस बात का ख़तरा की अगर उसने अमुक नेता या अफसर के ख़िलाफ़ कुछ लिखा या ओंन स्क्रीन कुछ कहा तो उसे उस अफसर या नेता से संबंधित एक्सक्लूसिव खबरों से महरूम होना पड़गा।
(५) नेता या अफसर से अपने निजी कामों के लिए सिफारिश करवाना