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ya! its me

शनिवार, मई 30

हाल ही में मैं अपने दोस्त अलोक के साथ उसके घर रामनगर घुमने गया.उसके साथ उसके ऑफिस के दो लड़के भी थे.इसी दौरान हमने एकदिन नदी में नहाने का प्रोग्राम बनया.मैं अलोक, उसके दोनों दोस्त और उसके चाचा का लड़का तरुण भी हमारे साथ जाने के लिए तैयार हो गया. रामनगर कार्बेट नेशनल पार्क के काफी पास पड़ता है और जहाँ हम नहाने गए थे वो जगह भी कार्बेट पार्क का हिस्सा है। जंगल में से होकर एक नदी बहती है वहीँ हमारा नहाने का इरादा था।गाड़ी उठाई और मस्ती मारते हुए चल पड़े नदी नहाने। जैसे ही हम उस जगह के पास पहुंचे सबको अन्दर ही अन्दर शेर का डर सताने लगा लेकिन सब जवान सबको अपनी मर्दानगी पर गुमान भला कोई क्यों कर ज़ाहिर करे की उसे डर लग रहा है। अपने दोस्तों के सामने कोई चूहा बनने के लिए तैयार ही नही था। चाहे बेशक इस नकली मर्दानगी के चक्कर में जान ही क्यों ना देनी पड़े कुर्बान हो जायेंगे पर अपने क्षत्रिये वंश पर कायरता का दाग ना लगने देंगे। उतर पड़े साहब नदी नहाने। नदी घाट के नीचे से हो कर बहती थी, घाट के दुसरी तरफ़ घना जंगल और वोही साइड थी जहाँ से शेर के आने का सबसे ज्यादा खतरा था इतने में बारिश के आने के आसार भी बन गए मौसम भी ऐसा हो गया की और ज्यादा डर लगने लगा थोडी ठण्ड सी भी हो गई हम लोग नहाने लगे पर तरुण ने ठण्ड का बहाना बना कर नहाने से इंकार कर दिया लेकिन पट्ठा तो एकदम चटक बना रहा वो हमारी नहाते हुए फोटो खीचने लगा। हम लोग नहाते रहे और बन्दा तो इस जुगाड़ में लग गया की अगर खुदा ना खास्ता शेर आता है तो उसे कैसे और किस तरह जल्दी से जल्दी गाड़ी तक पहुंचना है। और थोडी देर में मैंने देखा की वो बड़े बड़े पत्थर उठा कर नदी में गिरा रहा है मैंने पूछा की क्या कर रहा है भाई तो उसका जवाब था की ऊपर आराम से पहुँचने का रास्ता बना रहा हूँ । इतने में उसे एक दूसरा और आसन रास्ता मिल गया जिससे आसानी से और जल्दी से गाड़ी तक पहुँचा जा सकता था इतने में बारिश पड़ने लगी मैं तो कुछ ठण्ड से और कुछ शेर के डर से जल्दी से नहा कर bahar निकल आया दो लोग अभी नदी में नहा ही रहे थे की तभी हमने शेर की दहाड़ सुनी पहले toh badal की गर्जना समझ कर इग्नोर किया फिर एहसास हुआ की ये बदल की गर्जना तो आसपास सेही आ रही है तब समझ में आया की जिसका डर था वो ही हुआ शेर साक्षात् मौत के रूप में कहीं पास में ही था अचानक कोई चिल्लाया भागो शेर जो जिस हालत में था वैसे ही भाग खड़ा हुआ हम एकदम साँस छोड़ कर भागे गिरते पड़ते गाड़ी तक पहुंचे डर के मारे गाड़ी भी स्टार्ट नही हो रही थी अब बारिश के साथ ओले भी पड़ने लगे ।खैर किसी तरह गाड़ी स्टार्ट हुई । घर पहुंचे भगवान् का शुक्र मनाया और इस बात का भी निश्चये किया की अब कभी झूठी बाहुदरी के चक्कर में अपनी जनन कभी खतरे में नही डालूँगा । इस घटना ने मुझे सिखाया की कभी जंगल से मजाक नही करना चाहिए .

महेंद्रजी आपकी ये बात बिल्कुल सही है की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है पर इसका ये मतलब नहीं है की इंसान की अपनी कोई वैक्तिगत इच्छा ही ना हो. समाज इंसान की निजी इच्छा के लिए सिर्फ वहां तक ही बंधनकारी होने का हक रखता है जहाँ तक की वो समाज के बाकि लोगों के लिए नुकसान दाई हो रहा हो इसके आगे हर आदमी की वैक्तिगत इच्छा ही सर्वाधिक महत्व रखती है और जहाँ तक सवाल मान्यताओं और उससे bane समाज का है तो मान्यताएं भी मनुष्यों द्वारा ही निर्मित हुई हैं अप्रासंगिक होने पर वो ही इसे ख़त्म भी करेंगे वस्तुतः ये सामजिक रीति-रिवाज़ वो नियम हैं जो समय के हिसाब से समाज को चलाने के लिए बनाये गए थे, बनाए जाते हैं और बनाए जाते रहेंगे ये नियम शाश्वत नहीं हैं ये तो मनुष्य और समय की मांग के अनुरूप बदलते रहते हैं कुछ ऐसे रीति रिवाज़ जिनकी अब जरुरत नहीं है उनका ख़तम हो जाना ही श्रेयकर है मुझे नहीं लगता की आप भी सती प्रथा का समर्थन करेंगे ये रिवाज़ तो उस काल का है जब राजपूत किसी मुस्लिम शासक या दुसरे किसी अन्य शासक के खिलाफ अपनी मारने या मर जाने की आखरी जंग लड़ते थे और अपनी पत्निओं को इस लिए सती हो जाने के लिए कहते थे ताकि उन्हें शत्रुओं के हाथों अपमानित न होना पड़े पर बताओ आज भी क्या ऐसी स्थिति है की किसी औरत के पति के मरने पर उसे अपमानित होने से बचने के लिए सती होना पड़े नहीं आज ऐसी कोई विकट स्थति नहीं है पर उसके बावजूद भी कई नासमझ लोग इस बीसवी सदी तक इस प्रथा की वकालत करते रहे भला हो राजा राममोहन राए और विल्यम बैंटिक का जिसने इस प्रथा पर १८३५ में कानूनन रोक लगवाई नहीं तो आज भी ना जाने कितने लोग अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए अपने घर की मासूम बहूओं को सती की वेदी पर बलि चढाते खैर इतना सब कहने के पीछे मेरा मकसद सिर्फ ये कहना है की उन रीति रिवाजों को अब ख़तम कर देना चाहिए जिनकी आज आवश्कता ना हो.

गुरुवार, मई 28

यहाँ तो ये कहना भी बेमाने है की दंगे रोकना और आम जनता की जानमाल की हिफाज़त करना किसी भी राज्य और केन्द्र की नैतिक जिम्मेदारी है ऐसा मै इसलिए कह रहा हूँ शायद ज्यादातर प्रबुद्धजन इस तथ्य से भली भांति परचित होंगे की जब केन्द्र में कांग्रेस सरकार थी तो उसने इंदिरा गाँधी की हत्या का बदला सिखों के खिलाफ दंगे करवा कर लिया आज भी सिख अपने समुदायके साथ हुई नाइंसाफी के लिए इंसाफ की बाट जोह रहे हैं और बीजेपी ने भी गुजरात में बहुत मत पाने के लिए, हिंदू वोटों के एकमुश्त फसल काटने के लिए राज्य प्रायोजित दंगे करवाए और मार्क्सवादी पार्टियों का तो कहना ही क्या सिंगुर और नंदीग्राम में इनकी कारगुजारिओं को कौन भूल सकता है इसलिए सरकार चाहे वो केन्द्र में हो या राज्य में हो उससे इस बात की आशा करना की वो दंगे से आमजन की रक्षा करेगी अपनेआप को मुर्ख बनाना है

अब वापिस पंजाब लौटते हैं। दूर देश वियना में दो संतों पर गोलियां चलती है वहां की पुलिस ठीक समय पर कार्रवाई भी करती है पर इस देश में संत के अनुयाई वहां की पुलिस की इमानदारी पर विश्वास ना करते हुए तोड़फोड़ की कार्रवाई शरू कर देते हैं पता नही इन दो संतों ने अपने भक्तों को क्या उपदेश दिया था पर इतना मुझे विश्वास है की ये नही कहा होगा की तुम ट्रेनों को आग लगाओ,लोगों की हत्या करो ,बसों को आग के हवाले करो। मेरे विचार से सब दुसरे अच्छे संतों की तरह इन्होने भी अपने भक्तों को भले काम करने का ही उपदेश दिया होगा पर इसके बावजूद जो लोग इन संतों के शिष्य होने के नाम पर दंगे कर रहे वो इन संतों के सच्चे शिष्य नही बल्कि गुंडे बदमाश जिनके ख़िलाफ़ प्रभावित जनता को पुलिस की राह ना देखते हुए ख़ुद एक्शन लेकर अपने क्षेत्र से इन्हे भगा देना चाहिए

बुधवार, मई 27

पंजाब में फिर से आग लग गई,पहले गुरु राम रहीम की आग में जला अब स्वामी निरंजनानन्द और स्वामी राम नन्द की आग में जल रहा है पंजाब, हो सकता है की आप में से अधिकतर लोगों को ये लगे की पंजाब में अब खुशहाली ज्यादा आ गई जिसे पंजाब वाले अब पचा नहीं पा रहे इसलिये अब दंगा कर रहे हैं, हो सकता है की काफी लोगों को इस तर्क में दम ना नज़र आये और वो इसकी बजाये ये मानते हों की नहीं भाई, पंजाब तो महराष्ट्र से कॉम्पिटिशन की आग में जल रहा है की भाई दंगे करने और कराने में भला वो पीछे कैसे रह सकता अरे जब तरक्की की रास्ते में सब से आगे है तो फिर इसी फील्ड में मार क्यों खानी है आप कुछ भी सोचें लेकिन सच तो ये ही है की जल रहा है पंजाब आप शायद ये भी कहें की पंजाब के तो ग्रह ही ख़राब हैं तभी तो एक के बाद एक नई मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है पंजाब को। कहा जा रहा है की जिन लोगों ने इन दोनों संतों पर गोलियां चलाई हैं उनसे बदला ले रहे हैं दंगाई लेकिन कोई बसों में आग लगाने वाला, रेलों को नुक्सान पहुँचाने वाला मुझ ना समझ को ये तो समझाए की भाई गोली तो इन संतों को वियना में मारी गई इस में पंजाब में रहने वालों और दुसरे राज्यों से आने वाले मासूम नागरिकों से ऐसा क्या अपराध हो गया की इन संतों के अनुयाईओं ने इन्हे भी बराबर का दोषी मान कर दण्डित करना शुरू कर दिया इस देश और राज्य पर शासन करने वाले महान नेता कहाँ मुह छिपा कर सो रहे हैं की उन्हें इस सामान्य से तथ्य का का आभास नही की इन दंगों में वो लोग ही पिस रहे हैं जिनका इस सब से कुछ लेना देना नही है आख़िर लोगों ने तो ये ही सोचकर वोटिंग की थी न की सरकार दंगों या इसके जैसी किसी अन्य विपत्ति से उनकी सुरक्छा करेगी सरकार पर वो तो मारने वाले हाथ को पकड़ने की बजाये मार खाने वालों के मरहम लगा रही है की बेटा ठीक होने के बाद फिर मार खाने के लिए तैयार हो जाओ आख़िर कब चेतेगी सरकार ?

सोमवार, मई 11

"इज्ज़त बेटी से बड़ी नहीं" इस लाइन का मतलब मुझे समझ नहीं आया. क्योंकि पूरी कहानी का मूल स्वर तो कुछ और ही कह रहा है शायद लेखक ये कहना चाहता है की "इज्ज़त बेटी से बड़ी होती और इसी इज्ज़त को कायम रखने के लिए लोग अपनी बेटी की बलि चढाने से भी नहीं हिचकचाते.ख़ैर मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ की इस तरह की बर्बरता पूर्ण कार्रवाई सभ्य और खुले लोकतान्त्रिक समाज के लिए कलंक है पर क्या आप ने कभी इस बात पर ध्यान दिया की इस तरह की ज्यादातर घटनाएं गाँव देहातों में ज्यादा घटती हैं क्यों की वहां के समाज में हर एक आदमी अपनी आप को समाज पर निर्भर पाता है और वो समाज के प्रति भी संवेदनशील रहता है और खुद भी इस बात से अवेअर रहता है की उसके आसपास घट क्या रहा है. हर समाज की अपनी कुछ मान्यताएं होती हैं और उस समाज से जुड़ा हुआ हर आदमी ना सिर्फ उन परम्पराओं की इज्ज़त करता है बल्कि उन परम्पराओं के प्रति वफादार भी होता है जिन्हें हम रीति-रिवाज़ भी कह देते है कुछ रीति रिवाज़ अच्छे भी होते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जो आज के समय के हिसाब से आप्रसंगिक हो चुके होते हैं और जो अब एक बुराई बन चुके होते हैं पर समाज के लोग उन्हें अपने पुरखों की थाती मान कर उन्हें अपने सीने से उसी तरह चिपकाए रहते हैं जिस तरह से कोई बंदरिया अपने मरे हुए बच्चे को अपने सीने से चिपकाए रखती है और जब कोई उस मरे हुए बच्चे को उससे छीनने की कोशिश करता है तो बंदरिया उस व्यक्ति के ऊपर जानलेवा हमला कर देती है. उसी तरह जब कोई व्यक्ति या समूह उन सडी गली मान्यताओं को तोड़ने या झकझोरने की कोशिश करता है तो पूरा का पूरा समाज ही उसके खिलाफ खड़ा हो जाता है यहाँ तक उसके परिवार के लोग भी.जैसा की विवेक जी ने अपने लेख में लिखा है. समाज क्योंकि एक सिस्टम का नाम है और समाज एक मशीन की भांति काम करता है, मशीन के अन्दर भावनाएं नहीं होती वो अपने खिलाफ जाने वाले को निर्ममतापूर्वक कुचलता है ऐसे में किसी लड़की की बिरादरी की और परिवार की इज्ज़त के नाम पर हत्या हो जाना कोई अचरज की बात नहीं है.अब बात भारतीय समाज की तालिबान से तुलना की.तालिबान ने अफगानिस्तान में धर्म के नाम पर इतना कहर बरपाया है की बौद्धिक वर्ग को कहीं भी इस से मिलती जुलती घटना मिलने पर इस से कम या इससे ज्यादा तुलना करने का मन करने लगता है वो जरा भी इस बात पर ध्यान देने की कोशिश नहीं करते की हमारे देश में इस तरह की घटनाएं यदा कदा घटती है जबकि अफगानिस्तान में तालिबान के राज में इस तरह की घटनाएं रोज़ घटती थी और स्वात और बुनेर और जहाँ -जहाँ तालिबान जैसे कट्टरपंथी तत्वों का कब्ज़ा है वहां इस तरह घटनाएं होती रहती हैं और इसकी आशंका भी बनी रहती है तो फिर भारतीय समाज और तालिबान के कब्जे वाले अफगानिस्तान में भला किस तरह की तुलना हो सकती है?