ज़ी न्यूज़ू पर सुधीर चौधरी का रेप पीड़ित के दोस्त के साथ किया हुआ इंटरव्यू देखा..देख कर ऐसा लगा कि पीड़ित चाहे पुलिसिया कार्रवाई से चाहे इतना नाराज ना हो पर सुधीर चौधरी और उनका चैनल पुलिस से खासा नाराज दिखाई दिया..भाई नाराज हो भी क्यों न...पुलिसिया जूर्म के तो सुधीर चौधरी भी भुक्त भोगी हैं....क्योंकि जब उन्होने नवीन जिंदल से कोयला खदान वाले मामले को दबाने के लिए रिश्वत मांगी थी...तो नवीन जिंदल ने उनके खिलाफु पुलिस में एफआरआई दर्ज करवा दी थी...और बेचारे सुधीर चौधरी को कुछ समय के लिए पुलिस रिमांड में जाना पड़ा था..और चूंकि पुलिस ने सुधीर चौघरी की खातिरदारी अच्छे से नहीं की थी इसलिए सुधीर चौधरी पुलिस से नाराज नज़र आ रहे थे...और जानबूझ को पीड़ित के मुंह से ज्यादा से ज्यादा पुलिस के खिलाफ जहर उगलवाना चाह रहे थे....और पीड़ित तो खैर पुलिस के अमानवीय रवैये उसे नाराज था ही....इसलिए उसने भी पुलिस के खिलाफ जहर उगलने में कोई कोताही नहीं की....मैं मानता हं कि पीड़ित के खिलाफ पुलिस का रवैय दोस्ताना नहीं था....लेकिन अगर तर्कपूर्ण ढंग से सोचा जाए तो ऐसा राक्षसी भी नहीं था जिसकी इतनी मुखालफत की जाए...पीड़ित को शायद ये नहीं मालूम की पीसीआर वैन का काम तुरंत पीड़ित को मदद पहुंचाना होता है...पीसीआर की कोई ज्यूरीडिक्शन नहीं होती..और उसकी मदद के लिए तो तीन तीन पीसीआर वैन पहुंची थी...दूसरा आम जनता पर ये आरोप लगाना कि जनता ने उसकी कोई मदद नहीं की..बड़ा अजीब सा अहसास दिला रहा है कि अगर उसकी कोई मदद नहीं करता तो शायद वो सच में जिंदा नहीं होता..
शनिवार, अगस्त 28
हाय ये धर्म की दुकानदारी
लाजपत नगर रिंग रोड से मुझे अक्सर निकलना होता है कई सालों से मैं वहां से जा रहा हूँ। टाइम पास करने के लिए अक्सर मैं खिड़की के पास की सीट को प्राथमिकता देता हूँ। रोज वही सब देखता था पर ऐसा नहीं है कि जो रोज देखता था उसमे कोई बदलाव ही नहीं आता था बिलकुल आता था रोज सड़क पर मुझे तरक्की का नज़ारा मुझे रोज देखने को मिलता था। लाजपत नगर मार्केट के पास रिंग रोड से लगे हुए दो मंदिर थे। जितनी तरक्की मैंने इन दो मंदिरों की देखि उतनी तेज प्रोग्रेस मैंने कभी किसी की नहीं मेंरे देख ते देखते दोनों मंदिर, मंदिर से कब दुकानों में तब्दील हो गए मुझे पता ही नहीं चला। यदि आपको भी ये चमत्कार देखना तो आप भी जा कर देख सकते हो
गुरुवार, जून 24
खाप पंचायते उनके फैसले और समाज पर उनका असर
ललित मोदी का बी सी सी आई को खाप पंचायत बताना ये बता गया कि हर आम ओ खास में खाप पंचायतों के कि कारगुजारियों का खौफ किस कदर हावी हो रहा है। शायद कुछ दिनों बाद ये बात मुहावरे के रूप में भी कही जाने लगे। हर वो बात जिसमें ऐसा संदेह हो कि किसी ग्रुप या विशेष जन का अमुक निर्णय सनकपने या दकियानूसीपने की हद के आसपास है या फिर ऐसा डिसीजन जिससे बिना वजह क़ानून को चुनोती मिल रही हो तो थोड़ी ठीक सी अकल रखने वाला अपने आप से या किसी दुसरे से ये ही कहेगा की यार फलाने की सोच तो बिलकुल खाप पंचायेती सोच है देखो तो क्या सनकी डिसीजन लिया इसने की पूरा का पूरा घर बर्बाद हो जायेगा इसका । ये तो बात हुई की कैसे मुहावरों का जन्म होता है अब बात करते हैं की किन कारणों ने तथाकथित न्याय पंचायतों के लगभग अनपढ़ न्यायधिशों को कहाँ से इस बात की प्रेरणा दी वो विस्मयकरी निजी स्वतंत्रा को अघात पहुंचाने वाले फतवे दे सकें। इनके सबसे पहले प्रेरणा स्रोत तो इस्लाम की व्याख्या करने वाले वो उलेमा वर्ग है जो अपने फतवों को क़ानून,देश और सरकार से भी ऊपर मानते हैं। इनके पास भी कारण है अपने फतवों के ऊपर मानने क्यों की ये फतवा देने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि एक आम मुस्लिम धर्मभीरू है और धर्म को सर्वोच्च मानता है ऐसे में कई बार उलेमा अपने मुस्लिम समाज में सस्ती लोकप्रियता अर्जित करने के लिए जानबूझ कर देश के कानून से टकराने वाले फतवे देते हैं ताकि मीडिया में वो चर्चा का विषयबन सकें और मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग भी इनके फतवों को समर्थन करता है । अक्सर देखा गया है कि इस तरह के फतवे उदारवाद और आधुनिकता के विरोधी होते हैं. ये तो हुआ प्रेरणा स्रोत नो १ अब बात करतें हैं राजस्थान में हुए गूजरों के आरक्षण आन्दोलन कि जिसमे गुजरों कि महापंचायत ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक तरह से ये पंचायत गुजरों कि शक्ति का प्रतीक थी जिसने राजस्थान की सरकार को गुजरों की मांग के आगे झुकने के लिए मजबूर कर दिया था। अब इन पंचायतों को अपनी इस शक्ति का अहस्सा हो चूका था। इसलिए ये पंचायेतें अब ऐसे आदेश जारी कर रही हैं जिनको देते समय सुप्रीम कोर्ट भी १० बार सोचे। अगर समय रहते इस तरह कि तमाम पंचायतों को काबू नहीं किया गया तो वक़्त दूर नहीं हैं जब देश में कानून का शासन और सरकार कि सत्ता ख़त्म हो जाएगी
शनिवार, जून 5
कुछ दिनों पहले शीला दीक्षित ने कॉमन वेल्थ गेम्स से पहले दिल्ली में ऑटो रिक्शा को बैन कर देना चाहिए ऐसा बयान दिया था। ऑटो रिक्शा वालों ने शीला दीक्षित के उस बयान का बड़ा ही जबरजस्त विरोध किया था। विरोध लाज़मी भी था भाई किसी के पेट पर लात मारोगे तो चिल्लाएगा तो जरूर। मुझे शुरू -शुरू में तो मुख्यमंत्री के इस बयान पर काफी गुस्सा आया की भाई अगर सड़क से ऑटो हटा दिए तो इन ऑटो वालों का जो होगा वो तो होगा ही दिल्ली की उस जनता का क्या होगा जिसके पास अपनी खुद की सवारी नहीं है । एक तो पहले ही ऑटो वालों पर फाइनेंस माफिया की मार पड़ रही। उस पर शीला दीक्षित का ये बयान तो कोढ़ में खाज जैसा दिखाई देने लगा । सरकार ने तो बसों के किराए पहले ऐसे बढ़ा दिए थे की पहले से दिल्ली की आम जनता को ऐसा लगने लगा था की सरकार बस में बैठा कर हम से ऑटो का किराया मांग रही है। तो दिल्ली की जनता ने भी सोचा की जब सरकार बस से ऑटो का किराया ही वसूलना चाहती है तो क्यों न फिर ऑटो रिक्शा का ही इस्तेमाल किया जाये।
अब सरकार ऑटो को ही रोड से हटाने की बात करने लगी है । इन दिनों इस समस्या के बारे में सोच ही रहा था की एक दो ऐसे हादसे हुए की जिसने ये विश्वास दिलाया की शीला दीक्षित जी का निर्णय बिलकुल सही था।
जब जब ऑटो वालों से रोड पर सामना हुआ इन्होने ने मुझे लोहे के चने चबवा दिए। जब किसी ऑटो वाले को कही चलने के लिए कहता तो वो ऐसा किराया मांगता जैसे मैंने उसे चाँद पर चलने के लिए कह दिया हो। और अगर मैं कहता की भाई ये तो बहुत ज्यादा मांग रहे हो तो वो तुरंत गैस खतम हो जाने की घोषणा कर देता और ये रवैय्या किसी एक ऑटो वाले का नहीं कामोवेश सभी ऑटो वाले इसी फार्मूले को अप्प्लाई कर रहे हैं फिर मजबूरी में भैया से उनकी मोटर सायकल लेकर जब भी अपने गंतव्य की तरफ निकला तो मैंने पाया की ऑटो वाले भी ऑटो के हैंडल और मोटर साइकल के हैंडल में जातीय साम्यता होने के वजह से ऑटो को भी मोटर साइकल समझ कर चला रहे हैं जिधर मन हो रहा है उधर ही मोड़ ले रहे हैं । उनके ऑटो चलाने के इस खतरनाक तरीके की वजह से दो तीन बारी तो मैं ही मरने से बाल- बाल बचा। इन घटनाओं से सबक लेकर मुझे ये समझ में आया की सरकार के सारे फैसले जनहित विरोधी नहीं होते कुछ फैसले तात्कालिक नुक्सान करने वाले जरुर दिखाई देते हैं लेकिन उन निर्णयों में दूर की भलाई छिपी होती है । अब मैं इस मामले में sheela dikshit ji ke साथ हूँ आप क्या कहते हो दिल्ली वालों सड़क में दुर्घटना में मरना है या बसों में ज्यादा किराया दे कर शाम को सही सलामत घर लौटना है निर्णय आपके हाथ में है
अब सरकार ऑटो को ही रोड से हटाने की बात करने लगी है । इन दिनों इस समस्या के बारे में सोच ही रहा था की एक दो ऐसे हादसे हुए की जिसने ये विश्वास दिलाया की शीला दीक्षित जी का निर्णय बिलकुल सही था।
जब जब ऑटो वालों से रोड पर सामना हुआ इन्होने ने मुझे लोहे के चने चबवा दिए। जब किसी ऑटो वाले को कही चलने के लिए कहता तो वो ऐसा किराया मांगता जैसे मैंने उसे चाँद पर चलने के लिए कह दिया हो। और अगर मैं कहता की भाई ये तो बहुत ज्यादा मांग रहे हो तो वो तुरंत गैस खतम हो जाने की घोषणा कर देता और ये रवैय्या किसी एक ऑटो वाले का नहीं कामोवेश सभी ऑटो वाले इसी फार्मूले को अप्प्लाई कर रहे हैं फिर मजबूरी में भैया से उनकी मोटर सायकल लेकर जब भी अपने गंतव्य की तरफ निकला तो मैंने पाया की ऑटो वाले भी ऑटो के हैंडल और मोटर साइकल के हैंडल में जातीय साम्यता होने के वजह से ऑटो को भी मोटर साइकल समझ कर चला रहे हैं जिधर मन हो रहा है उधर ही मोड़ ले रहे हैं । उनके ऑटो चलाने के इस खतरनाक तरीके की वजह से दो तीन बारी तो मैं ही मरने से बाल- बाल बचा। इन घटनाओं से सबक लेकर मुझे ये समझ में आया की सरकार के सारे फैसले जनहित विरोधी नहीं होते कुछ फैसले तात्कालिक नुक्सान करने वाले जरुर दिखाई देते हैं लेकिन उन निर्णयों में दूर की भलाई छिपी होती है । अब मैं इस मामले में sheela dikshit ji ke साथ हूँ आप क्या कहते हो दिल्ली वालों सड़क में दुर्घटना में मरना है या बसों में ज्यादा किराया दे कर शाम को सही सलामत घर लौटना है निर्णय आपके हाथ में है
सोमवार, मार्च 1
नक्सलवादी चाहे ये दावा करें कि वो जनता के हित के लिए हथियार उठाये हुए हैं पर इस बात से वो चाह कर भी इनकार नहीं कर सकते कि इनकी गोली से चाहे पुलिस का आदमी मरे, मुखबिर मरे या फिर आम आदमी हैं तो सारे इसी समाज का हिस्सा सारे आपस में किसी ना किसी तरह इंटरकनेक्टेड हैं। नक्सलवादी कहते हैं कि उन्होंने सरकार के अन्याय के खिलाफ आवाज और हथियार उठाया है पर मैं कहता हूँ कि सरकार से भी अत्याचारी तो ये खुद हैं । आखिर किसने इन्हें अपने हक कि लड़ाई लड़ने के लिए नियुक्त किया है और यदि किसी ने किया भी हैं तो इससे इन्हें मनमाफिक हत्याएं करने का लाइसेंस नहीं मिल जाता ये अपनी बहादुरी ऐसे लोग पर दिखाते पास अपने नून रोटी का जुगाड़ सोचने से अहम् मुद्दा कुछ नहीं होता।
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