शनिवार, फ़रवरी 27
माओवाद कितना सच कितना झूठ
चिदम्बरम जी ने जब से नक्सलवादियों, माओवादियों के खिलाफ़ जंग का ऐलान किया है तब से माओ वादियों के हमले पहले से और तेज हो गए हैं ।शायद ये नक्सलवादी ग्रहमंत्री के फ़ोलादी इरादों से कुछ इस कदर डर गए हैं कि उन्हें अब अपना अंत निकट दिखाई दे रहा है इसलिए वो अधिक से अधिक हत्याएं करके आम जनमानस को डरा कर सरकार के इरादों को शिथिल करना चाहते हैं। माओवादी प्रत्यक्ष रूप से तो सिर्फ उन्ही लोगों कि हत्याएं कर रहे हैं जो किसी ना किसी रूप से सरकार से जुड़े हैं। ज्यादातर या तो पुलिस वाले, सुरक्षा बल के जवान या फिर नक्सलियों द्वारा करार दे के मार दिए जाने वाले मुखबिर हैं। इनके बीच में पिस रहे हैं आम लोग जिनका कोई भी कसूर नही है जबकि नक्सल वादियों का ये ही दावा है कि वो जो लड़ाई लड़ रहे हैं वो जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं। ये ऐसे कौन से आधिकार हैं जिन्हें आम जनता के लिए पाने के लिए आम जनता को ही मारा जा रहा है।आगे जारी....
मंगलवार, फ़रवरी 16
शुक्रवार, फ़रवरी 12
अपनी पिछली पोस्ट मैं में मैंने गंगा में हो रहे प्रदूषण के मुद्दे पर मीडिया की भूमिका की बात की थी इस मामले में कभी भी मीडिया ने सकारात्मक काम नही किया अभी भी वो इस मुद्दे को भुना ही रहा है। जब तक कुम्भ शुरू नही हुआ तभी तक मीडिया की नज़र में गंगा में प्रदुषण था । जैसे ही कुम्भ शुरू हुआ मीडिया को इस से संबंधित अन्य मनोरंजक सामग्री मिल गई इसलिए कुम्भ ख़तम होने तक ये चलेगा और उसके बाद तो गंगा मैया मीडिया से ओझल ही हो जाएगी ...................
गुरुवार, फ़रवरी 4
भ्रष्टाचार की गंगा
तो स्टोरी को आगे लेकर चलते हैं -जैसा की मैंने पहले ही बताया कि गंगा अब लोगों कि नजर में चढ़ चुकी थी कई सारे स्वयंसेवी सगठनों ने गंगा कि रक्षा के लिए अवतार ले लिया था। जिन्हें सरकार से गंगा कि सफाई के नाम पर मनमाफिक ग्रांट मिल रही थी ऐसे में गंगा कि सफाई का स्वांग भरने में भला बुराई ही क्या थी । अभी इस ढकोसले में एक बड़े खिलाड़ी का आना बाकि था और उस खिलाड़ी का नाम था विश्वा हिन्दू परिषद् , स्वघोषित हिन्दुओं का सबसे बड़ा हितैषी। गंगा ,गौ की रक्षा की कसम खाने वाले इस संगठन ने सच में गंगा को बचाने के लिए एक बहुत बड़े आन्दोलन का सूत्रपात किया काफी हद तक दूसरों के मुकाबले अपने अभियान में इसे सफलता भी मिली माँ गंगा के भक्तों के दिलों में इस संगठन ने जगह भी बनाई। अभी पूरी सफलता मिली भी नहीं थी किराम मंदिर आन्दोलन का वक़्त आ गया ,गंगा बचाओ आन्दोलन से मिली सफलता को इस संगठन ने राम मंदिर मुद्दे में भुनाया और अब गंगा को बचाना छोड़ कर राम मंदिर बनवाने लगे। बीजेपी को सत्ता कि सीढ़ी चढ़वाने लगे। इस तरह से विश्वा हिन्दू परिषद ने गंगा का इस्तेमाल सिर्फ प्रसिद्धी पाने के लिए किया। अब बाबा रामदेव कि बारी है वो भी लोगों को गंगा को बचाने के लिए गोलबंद कर रहे हैं । कुम्भ का वक़्त है गंगा में सिर्फ नाक डूबा कर डूब मरने का ही पानी बचा है । हरिद्वार में तमाम भारत के साधू संत जमा हो रहे हैं देखें क्या होता है अभी मैंने बाबा रामदेव कि बात उपर की थी। भाई सेलिब्रेटी आदमी हैं मीडिया उनके साथ है शायद अब की बार कुछ चमत्कार हो ही जाए लकिन मुझे ना जाने क्यों लगता है की वो सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए ही इस मुद्दे को हवा दे रहे हैं जहाँ तक इलेक्ट्रोनिक मीडिया का सवाल हैं तो भाई यहाँ जो दिखता है वो ही बिकता है मिडिया जानती है की आम हिन्दू जनमानस गंगा से बहुत ही गहरे भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है इस लिए इस गंगा में हो रहे प्रदूषण तथा सरकार की लापरवाही पर कार्यक्रम बना कर आसानी से काफी साडी एड और टी। र पी बटोरी जा सकती है। अब कुछ विराम देता हूँ इस मुद्दे पर हम आगे बात करेंगे। जारी...........
मंगलवार, फ़रवरी 2
भ्रष्टाचार को गाली देना और गंगा को बचाने की वकालत करना आज के जमाने का फैशन सा हो गया है। जिसे देखो वही माननीय भ्रष्टाचार को मार भगाने और गंगा को बचा लेने की दुहाई देता नज़र आता है। आप भी बोलेंगे कि भाईसाब आप को तो हर बात में मीन मेख निकालने की आदत है आप की सोच ही नकारात्मक है हर अच्छे काम और उस काम को करने वाले को आप शक्क की निगाह से देखते हैं ये कोई अच्छी बात तो नही है तो मेरा जवाब होगा भैया मैं भी ये ही मानना चाहता हूँ की आप सही हों और मैं गलत, पर मैं क्या करूँ इतिहास हमेशा ही ऐसे मामलों में सकारात्मक रूख के साथ उम्मीद का दामन थामने वालों को गलत ठहराता आया है। अगर आप को विश्वास न हो तो आईये हम इतिहास के पन्नों में ही जाकर झाँक लें की इतिहास क्या कहता है । आज से कई साल पहले राजीव गाँधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए गंगा को बचाने की मुहिम शुरू की थी। गंगा को साफ़ करने के लिए प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के लिए बहुत बड़ी रक़म जारी की थी पर हाल वही ढाक के तीन पात रहा। उस समय के प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के मेम्बरों के परिवार तर गए पर गंगा मैली की मैली रह गई। हाँ राजीव गाँधी की मुहिम ने इतना रंग जरुर दिखाया की लोगों की नज़र में गंगा चढ़ गई । उसके बाद तो गंगा को बचाने वालों का ताँता सा लग गया। इधर सरकार गंगा लगातार ख़राब हो रही हालत पर घड़ियाली आंसू बहाती उधर जगह -जगह गंगा पर बाँध बना कर सरकार गंगा का गला घोटने की कोशिश करती। आगे जारी
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