गुरुवार, जून 24
खाप पंचायते उनके फैसले और समाज पर उनका असर
ललित मोदी का बी सी सी आई को खाप पंचायत बताना ये बता गया कि हर आम ओ खास में खाप पंचायतों के कि कारगुजारियों का खौफ किस कदर हावी हो रहा है। शायद कुछ दिनों बाद ये बात मुहावरे के रूप में भी कही जाने लगे। हर वो बात जिसमें ऐसा संदेह हो कि किसी ग्रुप या विशेष जन का अमुक निर्णय सनकपने या दकियानूसीपने की हद के आसपास है या फिर ऐसा डिसीजन जिससे बिना वजह क़ानून को चुनोती मिल रही हो तो थोड़ी ठीक सी अकल रखने वाला अपने आप से या किसी दुसरे से ये ही कहेगा की यार फलाने की सोच तो बिलकुल खाप पंचायेती सोच है देखो तो क्या सनकी डिसीजन लिया इसने की पूरा का पूरा घर बर्बाद हो जायेगा इसका । ये तो बात हुई की कैसे मुहावरों का जन्म होता है अब बात करते हैं की किन कारणों ने तथाकथित न्याय पंचायतों के लगभग अनपढ़ न्यायधिशों को कहाँ से इस बात की प्रेरणा दी वो विस्मयकरी निजी स्वतंत्रा को अघात पहुंचाने वाले फतवे दे सकें। इनके सबसे पहले प्रेरणा स्रोत तो इस्लाम की व्याख्या करने वाले वो उलेमा वर्ग है जो अपने फतवों को क़ानून,देश और सरकार से भी ऊपर मानते हैं। इनके पास भी कारण है अपने फतवों के ऊपर मानने क्यों की ये फतवा देने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि एक आम मुस्लिम धर्मभीरू है और धर्म को सर्वोच्च मानता है ऐसे में कई बार उलेमा अपने मुस्लिम समाज में सस्ती लोकप्रियता अर्जित करने के लिए जानबूझ कर देश के कानून से टकराने वाले फतवे देते हैं ताकि मीडिया में वो चर्चा का विषयबन सकें और मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग भी इनके फतवों को समर्थन करता है । अक्सर देखा गया है कि इस तरह के फतवे उदारवाद और आधुनिकता के विरोधी होते हैं. ये तो हुआ प्रेरणा स्रोत नो १ अब बात करतें हैं राजस्थान में हुए गूजरों के आरक्षण आन्दोलन कि जिसमे गुजरों कि महापंचायत ने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। एक तरह से ये पंचायत गुजरों कि शक्ति का प्रतीक थी जिसने राजस्थान की सरकार को गुजरों की मांग के आगे झुकने के लिए मजबूर कर दिया था। अब इन पंचायतों को अपनी इस शक्ति का अहस्सा हो चूका था। इसलिए ये पंचायेतें अब ऐसे आदेश जारी कर रही हैं जिनको देते समय सुप्रीम कोर्ट भी १० बार सोचे। अगर समय रहते इस तरह कि तमाम पंचायतों को काबू नहीं किया गया तो वक़्त दूर नहीं हैं जब देश में कानून का शासन और सरकार कि सत्ता ख़त्म हो जाएगी
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