कुछ दिनों पहले शीला दीक्षित ने कॉमन वेल्थ गेम्स से पहले दिल्ली में ऑटो रिक्शा को बैन कर देना चाहिए ऐसा बयान दिया था। ऑटो रिक्शा वालों ने शीला दीक्षित के उस बयान का बड़ा ही जबरजस्त विरोध किया था। विरोध लाज़मी भी था भाई किसी के पेट पर लात मारोगे तो चिल्लाएगा तो जरूर। मुझे शुरू -शुरू में तो मुख्यमंत्री के इस बयान पर काफी गुस्सा आया की भाई अगर सड़क से ऑटो हटा दिए तो इन ऑटो वालों का जो होगा वो तो होगा ही दिल्ली की उस जनता का क्या होगा जिसके पास अपनी खुद की सवारी नहीं है । एक तो पहले ही ऑटो वालों पर फाइनेंस माफिया की मार पड़ रही। उस पर शीला दीक्षित का ये बयान तो कोढ़ में खाज जैसा दिखाई देने लगा । सरकार ने तो बसों के किराए पहले ऐसे बढ़ा दिए थे की पहले से दिल्ली की आम जनता को ऐसा लगने लगा था की सरकार बस में बैठा कर हम से ऑटो का किराया मांग रही है। तो दिल्ली की जनता ने भी सोचा की जब सरकार बस से ऑटो का किराया ही वसूलना चाहती है तो क्यों न फिर ऑटो रिक्शा का ही इस्तेमाल किया जाये।
अब सरकार ऑटो को ही रोड से हटाने की बात करने लगी है । इन दिनों इस समस्या के बारे में सोच ही रहा था की एक दो ऐसे हादसे हुए की जिसने ये विश्वास दिलाया की शीला दीक्षित जी का निर्णय बिलकुल सही था।
जब जब ऑटो वालों से रोड पर सामना हुआ इन्होने ने मुझे लोहे के चने चबवा दिए। जब किसी ऑटो वाले को कही चलने के लिए कहता तो वो ऐसा किराया मांगता जैसे मैंने उसे चाँद पर चलने के लिए कह दिया हो। और अगर मैं कहता की भाई ये तो बहुत ज्यादा मांग रहे हो तो वो तुरंत गैस खतम हो जाने की घोषणा कर देता और ये रवैय्या किसी एक ऑटो वाले का नहीं कामोवेश सभी ऑटो वाले इसी फार्मूले को अप्प्लाई कर रहे हैं फिर मजबूरी में भैया से उनकी मोटर सायकल लेकर जब भी अपने गंतव्य की तरफ निकला तो मैंने पाया की ऑटो वाले भी ऑटो के हैंडल और मोटर साइकल के हैंडल में जातीय साम्यता होने के वजह से ऑटो को भी मोटर साइकल समझ कर चला रहे हैं जिधर मन हो रहा है उधर ही मोड़ ले रहे हैं । उनके ऑटो चलाने के इस खतरनाक तरीके की वजह से दो तीन बारी तो मैं ही मरने से बाल- बाल बचा। इन घटनाओं से सबक लेकर मुझे ये समझ में आया की सरकार के सारे फैसले जनहित विरोधी नहीं होते कुछ फैसले तात्कालिक नुक्सान करने वाले जरुर दिखाई देते हैं लेकिन उन निर्णयों में दूर की भलाई छिपी होती है । अब मैं इस मामले में sheela dikshit ji ke साथ हूँ आप क्या कहते हो दिल्ली वालों सड़क में दुर्घटना में मरना है या बसों में ज्यादा किराया दे कर शाम को सही सलामत घर लौटना है निर्णय आपके हाथ में है
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