मंगलवार, फ़रवरी 2
भ्रष्टाचार को गाली देना और गंगा को बचाने की वकालत करना आज के जमाने का फैशन सा हो गया है। जिसे देखो वही माननीय भ्रष्टाचार को मार भगाने और गंगा को बचा लेने की दुहाई देता नज़र आता है। आप भी बोलेंगे कि भाईसाब आप को तो हर बात में मीन मेख निकालने की आदत है आप की सोच ही नकारात्मक है हर अच्छे काम और उस काम को करने वाले को आप शक्क की निगाह से देखते हैं ये कोई अच्छी बात तो नही है तो मेरा जवाब होगा भैया मैं भी ये ही मानना चाहता हूँ की आप सही हों और मैं गलत, पर मैं क्या करूँ इतिहास हमेशा ही ऐसे मामलों में सकारात्मक रूख के साथ उम्मीद का दामन थामने वालों को गलत ठहराता आया है। अगर आप को विश्वास न हो तो आईये हम इतिहास के पन्नों में ही जाकर झाँक लें की इतिहास क्या कहता है । आज से कई साल पहले राजीव गाँधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए गंगा को बचाने की मुहिम शुरू की थी। गंगा को साफ़ करने के लिए प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के लिए बहुत बड़ी रक़म जारी की थी पर हाल वही ढाक के तीन पात रहा। उस समय के प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के मेम्बरों के परिवार तर गए पर गंगा मैली की मैली रह गई। हाँ राजीव गाँधी की मुहिम ने इतना रंग जरुर दिखाया की लोगों की नज़र में गंगा चढ़ गई । उसके बाद तो गंगा को बचाने वालों का ताँता सा लग गया। इधर सरकार गंगा लगातार ख़राब हो रही हालत पर घड़ियाली आंसू बहाती उधर जगह -जगह गंगा पर बाँध बना कर सरकार गंगा का गला घोटने की कोशिश करती। आगे जारी
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