सोमवार, अगस्त 10
बुधवार, जून 24
ये अनुभव है मेरी भाभी के फादर डॉ श्री कमल शर्मा का जो उन्होंने मेरे साथ शेयर किया और मैं आप के साथ कर रहा हूँ. ये अनुभव उनका तब का है जब वो सागर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे, सागर विश्वविद्यालय की तरफ से उन्हें किसी प्रोजेक्ट के सिलसले में लन्दन भेजा गया. जहाँ उन्हें ३ साल तक रूकना था.अनजान देश था. अजनबी लोग थे.वक़्त मुश्किल था.वहां जाकर उन्हें महसूस हुआ की अपने देश में रहना, अपने लोगों के बीच रहना कितना सुखद होता है। हलाँकि ब्रिटेन में हिन्दुस्तानियों
की कमी नहीं लेकिन ऐसा करना भी ठीक नहीं था की सड़क पर चलते किसी भी भारतीय को पकड़ कर उससे सड़क पर बात करने लगो. हाँ ये बात मन में जरुर थी की काश कोई जिस विश्विद्यालय में काम के सिलसिले में आयें हैं वहां ही कोई अपने देश का मिले. जैसे-जैसे समय बीता उनकी मनोकामना भी पूरी हुई। कुछ भारतीय उन्हीं की तरह वहां थोड़े समय के लिए आये हुए थे उन से उनकी जान पहचान भी हुई पर ये जान-पहचान कभी फौर्मल्टी के रिश्ते से आगे ना जा सकी।उसी यूनिवर्सिटी में अबुल खालिक अंसारी नाम के एक पाकिस्तानी प्रोफेसर भी थे, ये साहब यहाँ की स्थाई नागरिकता ले चुके थे। इन साहब से भी रिश्ता औपचारिक ही था।
इंग्लैंड में शर्माजी को खाने-पीने की बड़ी परेशानी थी वजह थी इंग्लैंड के बहुसंख्यक लोगों का मांसाहारी होना और शर्माजी का शुद्ध शाकाहारी होना। उन्हें शाकाहारी खाना खोजने के लिए बहुत परेशान होना पड़ता था। एक दिन वो ऐसे ही एक शाम पिज्जा रेस्ट्रोरेन्ट में जा पहुंचे वहां अबुल साहब भी मौजूद थे औपचारिक हालचाल हुआ शर्मा जी ने पिज्जा आर्डर किया इससे पहले की वो पिज्जा का टुकडा मुंह में डालते अबुल साहब लपक के उनके पास पहुंचे और बोले अरे !शर्मा जी ये आप क्या कर रहें हैं इसमें तो सूअर का मांस है शर्माजी ये सुन कर भौच्च्के रह गए। शर्माजी ने जब पिज्जा के कवर देखा तो उस पर लिखा भी था खैर शर्माजी अपना धर्म खोने से बाल-बाल बचे उन्होंने अबुल साहब का धन्येवाद किया और अपनी समस्या बताई। अबुल साहब ने मदद का भरोसा दिलाया की वो मदद करेंगे। अगले दिन अबुल साहब ने शर्मा जी को ऐसी कई जगह बताई जहाँ से शर्मा जी अपने लिए शाकाहारी खाने का जुगाड़ कर सकते थे । अबुल साहब ने शर्माजी को अपने घर आने का निमंत्रण भी दिया.शर्माजी अबुल साहब के घर गए जहाँ अबुल साहब की बीबी ने शर्माजी का काफी जोरदार इस्तकबाल किया. धीरे-धीरे जान-पहचान बढ़ती गई और फिर अच्छी खासी दोस्ती हो गई. तीन साल पंख लगा कर उड़ गए. शर्मा जी की विदाई का वक़्त नज़दीक आ गया. शर्मा जी जब भारत लौटने के लिए जब एअरपोर्ट पहुंचे तो पूरी अबुल-परिवार उन्हें विदा करने के लिए एअरपोर्ट आया. जब शर्मा जी विदा लेकर जाने लगे तो अबुल साहब ने शर्माजी का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा की काश! मुल्क का बटवारा ना हुआ होता और फिर ये भी कहा की अगर दोनों मुल्कों के बीच ये दुश्मनी की दिवार ना होती तो कम से कम हम एक दुसरे को ख़त तो लिख सकते. इस तरह दो जानी-दुश्मन देश के बाशिंदे कैसे एक दुसरे के दोस्त बन जाते हैं ये इस किस्से से पता चलता है.वैसे भी पाकिस्तान और हिंदुस्तान के बीच का झगडा तो सिर्फ राजनितिक है जिसे नेता लोग अपने-अपने फायदे के लिए हवा देते रहते हैं अगर लीडर इस तरह की हरकतें बंद कर दें तो कोई शक नहीं की ये दुश्मनी भी अपने आप ख़त्म हो जायगी
शनिवार, मई 30
महेंद्रजी आपकी ये बात बिल्कुल सही है की मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है पर इसका ये मतलब नहीं है की इंसान की अपनी कोई वैक्तिगत इच्छा ही ना हो. समाज इंसान की निजी इच्छा के लिए सिर्फ वहां तक ही बंधनकारी होने का हक रखता है जहाँ तक की वो समाज के बाकि लोगों के लिए नुकसान दाई हो रहा हो इसके आगे हर आदमी की वैक्तिगत इच्छा ही सर्वाधिक महत्व रखती है और जहाँ तक सवाल मान्यताओं और उससे bane समाज का है तो मान्यताएं भी मनुष्यों द्वारा ही निर्मित हुई हैं अप्रासंगिक होने पर वो ही इसे ख़त्म भी करेंगे वस्तुतः ये सामजिक रीति-रिवाज़ वो नियम हैं जो समय के हिसाब से समाज को चलाने के लिए बनाये गए थे, बनाए जाते हैं और बनाए जाते रहेंगे ये नियम शाश्वत नहीं हैं ये तो मनुष्य और समय की मांग के अनुरूप बदलते रहते हैं कुछ ऐसे रीति रिवाज़ जिनकी अब जरुरत नहीं है उनका ख़तम हो जाना ही श्रेयकर है मुझे नहीं लगता की आप भी सती प्रथा का समर्थन करेंगे ये रिवाज़ तो उस काल का है जब राजपूत किसी मुस्लिम शासक या दुसरे किसी अन्य शासक के खिलाफ अपनी मारने या मर जाने की आखरी जंग लड़ते थे और अपनी पत्निओं को इस लिए सती हो जाने के लिए कहते थे ताकि उन्हें शत्रुओं के हाथों अपमानित न होना पड़े पर बताओ आज भी क्या ऐसी स्थिति है की किसी औरत के पति के मरने पर उसे अपमानित होने से बचने के लिए सती होना पड़े नहीं आज ऐसी कोई विकट स्थति नहीं है पर उसके बावजूद भी कई नासमझ लोग इस बीसवी सदी तक इस प्रथा की वकालत करते रहे भला हो राजा राममोहन राए और विल्यम बैंटिक का जिसने इस प्रथा पर १८३५ में कानूनन रोक लगवाई नहीं तो आज भी ना जाने कितने लोग अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए अपने घर की मासूम बहूओं को सती की वेदी पर बलि चढाते खैर इतना सब कहने के पीछे मेरा मकसद सिर्फ ये कहना है की उन रीति रिवाजों को अब ख़तम कर देना चाहिए जिनकी आज आवश्कता ना हो.
गुरुवार, मई 28
यहाँ तो ये कहना भी बेमाने है की दंगे रोकना और आम जनता की जानमाल की हिफाज़त करना किसी भी राज्य और केन्द्र की नैतिक जिम्मेदारी है ऐसा मै इसलिए कह रहा हूँ शायद ज्यादातर प्रबुद्धजन इस तथ्य से भली भांति परचित होंगे की जब केन्द्र में कांग्रेस सरकार थी तो उसने इंदिरा गाँधी की हत्या का बदला सिखों के खिलाफ दंगे करवा कर लिया आज भी सिख अपने समुदायके साथ हुई नाइंसाफी के लिए इंसाफ की बाट जोह रहे हैं और बीजेपी ने भी गुजरात में बहुत मत पाने के लिए, हिंदू वोटों के एकमुश्त फसल काटने के लिए राज्य प्रायोजित दंगे करवाए और मार्क्सवादी पार्टियों का तो कहना ही क्या सिंगुर और नंदीग्राम में इनकी कारगुजारिओं को कौन भूल सकता है इसलिए सरकार चाहे वो केन्द्र में हो या राज्य में हो उससे इस बात की आशा करना की वो दंगे से आमजन की रक्षा करेगी अपनेआप को मुर्ख बनाना है
अब वापिस पंजाब लौटते हैं। दूर देश वियना में दो संतों पर गोलियां चलती है वहां की पुलिस ठीक समय पर कार्रवाई भी करती है पर इस देश में संत के अनुयाई वहां की पुलिस की इमानदारी पर विश्वास ना करते हुए तोड़फोड़ की कार्रवाई शरू कर देते हैं पता नही इन दो संतों ने अपने भक्तों को क्या उपदेश दिया था पर इतना मुझे विश्वास है की ये नही कहा होगा की तुम ट्रेनों को आग लगाओ,लोगों की हत्या करो ,बसों को आग के हवाले करो। मेरे विचार से सब दुसरे अच्छे संतों की तरह इन्होने भी अपने भक्तों को भले काम करने का ही उपदेश दिया होगा पर इसके बावजूद जो लोग इन संतों के शिष्य होने के नाम पर दंगे कर रहे वो इन संतों के सच्चे शिष्य नही बल्कि गुंडे बदमाश जिनके ख़िलाफ़ प्रभावित जनता को पुलिस की राह ना देखते हुए ख़ुद एक्शन लेकर अपने क्षेत्र से इन्हे भगा देना चाहिए